卐 सत्यराम सा 卐
जब लग यहु मन थिर नहीं, तब लग परस न होइ ।
दादू मनवा थिर भया, सहज मिलैगा सोइ ॥
हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ ।
दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥
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साभार ~ सनातन धर्म एक ही धर्म
प्रश्न :- यदि सब कार्य अपने पुरुष प्रयत्न से सिद्ध होते हैं, तो प्रह्लाद श्री विष्णु के वर बिना क्यों न जागा, जब विष्णु ने वर दिया तब उसको ज्ञान प्राप्त हुआ?
उत्तर :- प्रह्लाद को जो कुछ प्राप्त हुआ वह पुरु षार्थ से प्राप्त हुआ, पुरुषार्थ बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। जैसे तिलों और तेल में कुछ भेद नहीं, तैसे ही विष्णु भगवान् और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जो विष्णु है, वह आत्मा है, और जो आत्मा है, वह विष्णु है, विष्णु और आत्मा दोनों एक वस्तु के नाम हैं, जैसे जल और नीर दोनों एक नाम हैं।
प्रह्लाद ने जो प्रथम अपने आपसे अपनी प्रेमशक्ति विष्णुभक्ति में लगाई, सो आत्मशक्ति से लगाई, आत्मा से आप ही निर्विचार अवस्था में जाके(मन के पार) कदाचित् आत्मा मैं आप ही अपनी शक्ति से जागता है, अथवा विष्णुशक्ति से जागता है। प्रहलाद चिरपर्यन्त आत्मसात करता हुवा आत्मवान हुआ। बिना आत्मसात के विष्णु भी ज्ञान नहीं दे सकता। आत्मा के साक्षात्कार में मुख्य कारण अपने पुरुषार्थ से उपजा विचार है, और गौण कारण वर आदिक है। प्रथम पाँचों इन्द्रियों को होसपूर्वक जान के और चित्त को आत्मविचार में लगाना होगा। जो कुछ किसी को प्राप्त होता है, वह अपने पुरुषार्थ से होता है, पुरुषार्थ बिना नहीं होता।
अपने पुरुषार्थ प्रयत्न से इन्द्रियरूपी पर्वत को लाँघे तो फिर संसारसमुद्द से तर जावे, और तब परमपद की प्राप्ति हो। जो पुरुष के प्रयत्न बिना जनार्दन मुक्ति दें तो मृग पक्षियों को क्यों दर्शन देकर उद्धार नहीं करता, जो गुरु अपने पुरुषार्थ बिना उद्धार करते तो अज्ञानी अविचारी ऊँट, बैल आदि पशुओं को क्यों नहीं कर जाते। इससे विष्णु, गुरु इत्यादि और किसी के पाने की इच्छा बुद्धिमान् नहीं करते हैं। अपने मन के स्वस्थ किये बिना परम सिद्धता की प्राप्ति महात्मा पुरुष नहीं जानते। जिन्होंने वैराग्य और अभ्यास से इन्द्रियरूपी शत्रु वश किये हैं, वे अपने आपसे उसको पाते हैं और किसी से नहीं पाते।
सनातन धर्म एक ही धर्म के लिए...

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