रविवार, 17 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. २९/३०) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*३. भोजनकृत पाखंड वर्णन*
*केचित् करहिं कष्ट तन भारी ।*
*भोजन पंच ग्रास आहारी ॥*
*केचित् अन्न गऊ मुख खांहीं ।*
*घुटरिनि परहि अकल कछु नांहीं ॥२९॥*
कुछ लोग शरीर को(अत्यल्प भोजन देकर) कष्ट देने में ही जीवन्मुक्ति समझते हैं और पंच-ग्रास भोजन के सहारे अपना जीवन-यापन करते हैं । (पंच-ग्रास से कवि का तात्पर्य है-१. भोजन के प्रथम पाँच ही ग्रास लेने बाद फिर न खाना; या २. अत्यन्त अल्प भोजन करना; या ३. प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान-इन पाँच वायुओं को ही पंच ग्रास के रुप में भक्षण करना; या ४. कौआ, कुत्ता, गौ, अतिथि और क्षुद्र कीट आदि के लिये पंच-ग्रास निकालना) । 
कुछ मूर्ख अन्न को हाथों से न खाकर घुटनों के बल बैठकर गौ की तरह सीधे मुँह से ही खाते हैं, हाथ का उपयोग नहीं करते; या गौ को खिलाकर उसके पैरों में प्रणाम कर ही खाते हैं, या गौ को अन्न चराकर फिर उसके गोबर में जो अन्न निकले उसे उञ्छ वृति से एक-एक दाना चुन-चुन कर खाने में ‘मोक्ष’ समझते हैं । ऐसे लोग अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ ही खोते हैं ॥२९॥
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*केचित् कर धरि भिक्षा पावैं ।*
*हाथ पूँछि जंगल कौं धावैं ॥*
*केचित् घर घर मांगहि टूका ।*
*बासी कूसी रुखा सूका ॥३०॥*
कुछ पाखण्डी लोग हाथ में रखकर भिक्षान्न खाते हैं और खाने के बाद हाथ पोंछ कर जंगल की और(गाँव से बाहर) ऐसा भागते हैं कि मानों इनको दुनिया से इतना वैराग्य है कि ये उसे एक क्षण नहीं देखना चाहते । कुछ लोग घर-घर घूम कर रोटी का एक-एक टूकडा जो अधिक से अधिक दिन का बना हुआ(बासी) रूखा-सूखा हो, माँगते हैं और इसी में अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढते हैं ॥३०॥
(क्रमशः)

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