सोमवार, 1 अगस्त 2016

= विरह का अंग =(३/१३०-२)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विरह का अँग ३ =**
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छिन - विछोह
दादू पड़दा पलक का, येता अंतर होइ ।
दादू विरही राम बिन, क्यों करि जीवे सोइ ॥१३०॥
विरही भक्त को क्षण का भगवद् - वियोग भी असह्य है, यह कह रहे हैं - जैसे नेत्र पर पलक का पड़दा आ जाता है, तब उसे कुछ भी नहीं दीखता, वैसे ही विरही भक्त और भगवन् के मध्य एक क्षण का अन्तराय भी विरही के जीवन को अंधकारमय बना देता है, फिर यह विरही - भक्त राम के साक्षात्कार बिना सुखपूर्वक कैसे जीवित रह सकता है ?
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विरह - लक्षण
काया मांहैं क्यों रह्या, बिन देखे दीदार ।
दादू विरही बावरा, मरे नहीं तिहिँ बार ॥१३१॥
१३१ - १३२ में विरह लक्षण कह रहे हैं - हे विरही भक्त ! भगवत् साक्षात्कार के बिना तेरा प्राण शरीर में कैसे रह रहा है ? उत्तम विरही तो मीन - वारि सम भगवत् मिलन बिना जीवित नहीं रह सकता । जो विरही भगवन् के लिए तत्काल नहीं मर सकता; वह वास्तविक विरह की स्थिति से अनभिज्ञ तथा पागल है ।
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बिन देखे जीवै नहीं, विरह का सहिनाण ।
दादू जीवै जब लगैं, तब लग विरह न जाण ॥१३२॥
वास्तव में तीव्र विरह प्रकट होने पर विरही भक्त भगवन् को बिना देखे जीवित नहीं रह सकता । यही उत्तम विरह का लक्षण है । जब तक सुख पूर्वक जीवित है, तब तक उत्तम विरह नहीं जानना चाहिए ।
(क्रमशः)

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