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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
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*= रघुनाथजी को उपदेश =*
मेड़ता नगर में एक दिन रघुनाथ नामक एक व्यक्ति दादूजी का नाम सुनकर दादूजी के दर्शन करने आये । उनमें भगवद् भक्ति के संस्कार तो थे किन्तु भक्ति की वास्तविक साधन-पद्धति गुरु बिना ज्ञात नहीं होती है । इससे अन्तःकरण के विकार निकलते नहीं हैं ऐसी ही स्थिति रघुनाथजी की थी ।
दादूजी का दर्शन करके उन्हें अति प्रसन्नता हुई । वे दादूजी महाराज को प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए दादूजी के सामने बैठ गये । उनको जिज्ञासु की भांति बैठे देखकर दादूजी ने उनकी स्थिति जान गए और उनके अधिकार के अनुसार ही उनको उपदेश देने के लिये यह पद बोला -
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इत१ घर चोर न मूसे२ कोई,
अन्तर है जे जाने सोई ॥टेक॥
जागहु रे जन तत्त्व न जाई,
जागत है सो रह्या समाई ॥१॥
जतन जतन कर राखहु सार,
तस्कर उपजैं कौन विचार ॥२॥
इव३ कर दादू जाणैं जे,
तो साहिब शरणागति ले ॥३॥
जो अपने भीतर आत्म स्वरूप ब्रह्म है, उसे जो जानते हैं उनके यहां१ अन्तःकरण रूप घर से काम, क्रोधादिक चोर ज्ञान-धन को नहीं चुरा२ सकते हैं । हे जन ! मोह निद्रा से जागो जिससे ज्ञान जन्य सार आनन्द नहीं जा सकेगा । जो ज्ञान-जाग्रत अवस्था में है, वह उसी ज्ञान के आनन्द में समाया रहता है ।
यदि तुम बारंबार विचार रूप उपाय द्वारा सार ज्ञान की रक्षा करोगे तो किस विचार से हृदय में कामादि चोर उत्पन्न हो सकेंगे ? अर्थात् आत्मज्ञान के रहते कामादि को उत्पन्न करने वाला कोई भी विचार हृदय में नहीं आता है । इस३ प्रकार जो आत्मा से अन्य कामादि को चोर जानकार सचेत रहता है तो, प्रभु उसे अपनी शरण में लेते हैं अर्थात् अपने में ही लय कर लेते हैं ।
उक्त उपदेश सुनकर रघुनाथ विकारों को हृदय से निकालने का रहस्य सम्यक् प्रकार समझ गये और दादूजी के ही शिष्य हो गये फिर मेड़ता में ही दादूजी महाराज की साधन पद्धति के अनुसार निर्गुण भक्ति में रत्त हो गये । उन्होंने अपना साधन धाम मेड़ता ही बनाया । वहां ही साधन करके प्रभु का साक्षात्कार किया । रघुनाथजी भी दादूजी के ५२ शिष्यों में हैं ।
(क्रमशः)

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