गुरुवार, 11 अगस्त 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (द्वि.उ. १३/४) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*ज्यौं पतिब्रता रहै पति पासा ।*
*ऐसैं स्वामी की ढिग दासा ।* 
*काहू दिशा भूलि जौ जाई ।*
*तौ पतिब्रत जु रहै नहिं भाई ॥१३॥*
(इसी बात को श्री गुरुदेव उदाहरण देकर समझा रहे हैं-) जैसे पतिव्रता स्त्री दिन-रात मन-वचन-कर्म से अपने पति के सामने रहती है, उसी तरह साधक को सेवक के रुप में अपने स्वामी(इष्ट देव) के सामने रहना चाहिये । क्योंकि यदि पतिव्रता स्त्री की किसी भी तरफ से पति से जुदाई होने लगे तो उसका पतिव्रत-धर्म अक्षुण्ण नहीं रह पाता ॥१३॥
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*नैकु न पाँव आन दिश धारै ।*
*जौ पति कहै सु आज्ञा पारै ।* 
*सदा अखण्डित सेवा लावै ।*
*सोई भक्ति अनन्य कहावै ॥१४॥*
अत: पतिव्रता स्त्री को मन, वचन, कर्म से कोई गलत काम नहीं
करना चाहिये । पतिदेव जो भी आज्ञा करें, उसे शिरोधार्य कर पालन करना चाहिये । और उसे अपने पति की निरन्तर(आठों पहर) सेवा करनी चाहिये । साधक को इसी पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए स्वामी(भगवान्) के प्रति अनन्य(एकनिष्ठ) भक्तियोग की साधना करनी चाहिये ॥१४॥
(क्रमशः)

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