🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
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*(१)अथ भक्तियोग ~ चौपई*
*भक्तियोग अब सुनहु सयाना ।*
*बुद्धि प्रवांन जु करौं वषांना ।*
*भक्ति करन का यहु आरंभा ।*
*महल उठै जौ थिर ह्वै थंभा ॥१॥*
हे बुद्धिमान् शिष्य ! पिछले प्रकरण में कहे हुए तीन योगों में से प्रथम भक्तियोग के विषय में सुनो । मैं यथामति उसका वर्णन करूँगा । भक्तियोग की साधना के लिये मैं तुम्हें प्रथम(प्रमुख) उपाय बता रहा हूँ, यह उतना ही आवश्यक है जितना तिमंजिला-चौमंजिला मकान(=महल) बनाने में उसके लिये पहले मजबूत और पुख्ता खम्भे आवश्यक होते हैं ॥१॥
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*प्रथमहिं पकरै दृढ वैरागा ।*
*गहि विश्वास करै सब त्यागा ।*
*जितेन्द्रिय अरु रहै उदासी ।*
*अथवा गृह अथवा बनवासी ॥२॥*
(वह प्रथम उपाय है -) आरम्भ में संसार के प्रति दृढ वैराग्य धारण करना । ‘हमें सांसारिक वस्तुओंका कोई उपयोग नहीं है’- ऐसा दृढ विश्वास करके सांसारिक वस्तुओं का त्याग करना ‘वैराग्य’ कहलाता है । वैराग्य के बाद, जिज्ञासु इन्द्रियों पर निग्रह करते हुए जितेन्द्रिय होकर संसार के प्रति पूर्ण उपेक्षा-भाव रखते हुए घर में रहे या वन में(एकान्त में) रहने के लिये चला जाय ॥२॥
(क्रमशः)

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