卐 सत्यराम सा 卐
जब लग लालच जीव का, तब लग निर्भय हुआ न जाइ ।
काया माया मन तजै, तब चौड़े रहै बजाइ ॥
पीछे को पग ना भरे, आगे को पग देइ ।
दादू यहु मत शूर का, अगम ठौर को लेइ ॥
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साभार ~ Rp Tripathi
** निर्भय-जीवन ? :: एक संक्षिप्त विवेचना **
सम्मानित मित्रो ;
निःसंदेह हम सब निर्भय-जीवन जीना चाहते हैं ; और जीवन भर सुरक्षित जीवन जीने के सूत्र तलाशते ही रहते हैं !! परन्तु यदि हम अपने शास्त्रों का अध्ययन करें ; तो हमें संस्कृत भाषा में एक सूत्र मिलता है :-- धर्मो रक्षति रक्षतः !!
जिसका अर्थ है :--
जो धर्म की रक्षा करता है ; धर्म उसकी रक्षा करता है !! उसी तरह जिस तरह :-- जो क़ानून की रक्षा करता है ; क़ानून उसकी रक्षा करता है !! और मित्रो शास्त्र का कहना है कि :-- यदि हम सब इस एक सूत्र को ही जीवन में धारण कर लें ? तो हम अपना सम्पूर्ण जीवन ; निर्भयता से जी सकते हैं !!
परन्तु मित्रो ;
इसके लिए हमें पहले क़ानून की तरह ; धर्म को भी समझना होगा कि :-- धर्म क्या है ? और हम कितने क़ानून की तरह उसके पालक ; अर्थात धार्मिक हैं ?
मित्रो यह तो हम सब जानते हैं कि :--
कर्म तीन भागों में संपादित होता है :-- मनसा-वाचा-कर्मणा ; जिसमें प्रथम भाग ; मनोभाव अदृश्य है ; और अंतिम दो भाग ; वाचिक और शारीरिक दृश्य !! परन्तु कोई कर्म शुभ है ? या अशुभ ? इसका निर्धारण जिस तरह दृश्य भाग नहीं ; अदृश्य भाग से होता है !! उसी तरह कोई भी व्यक्ति ; धार्मिक है ? या अधार्मिक ? इसका भी निर्धारण ; क़ानून की ही तरह; हमारे शारीरिक या वाचिक कर्मों के दृश्य भाग नहीं ; वरन उन दोनों के पीछे छुपा अदृश्य मनोभाव ही करता है !!
संत तुलसीदास जी के अनुसार :--
परहित सरिस धर्म नहीं भाई ; पर-पीड़ा सम नहीं अधमाई !! अर्थात ; परहित की मनो-भावना से युक्त कर्म ; धर्म है ; और पर-पीड़ा की मनो-भावना से युक्त कर्म ; अधर्म !!
और हम कितने धार्मिक हैं ? या अधार्मिक ?
इसका निर्धारण होता है हमारी स्वयं की शांत और अशांत मनोदशा से !! यदि हम शांत हैं ? तो हैं धार्मिक ; और यदि अशांत हैं ? तो हैं अधार्मिक !!
क्योंकि ;
जब हम शांत मनोदशा में होते हैं ; तभी हमसे परहित के कार्य संपादित हो सकते हैं ; अन्यथा नहीं !! यह उसी तरह हैं जैंसे :-- धन वितरण की दक्षता प्राप्त करने के लिए ; पहले स्वयं धनी बनना पड़ता है !! यही नियम पर-पीड़ा अर्थात अधर्म पर भी लागू होता है !! हम अन्य को पीड़ा देने में भी ; तभी सक्षम होते हैं ? जब हम पहले स्वयं पीड़ा-ग्रस्त हों ; अन्यथा नहीं !!
और मित्रो ;
हम अशांत या पीड़ा-ग्रस्त क्यों होते हैं ? इसका एक-मात्र कारण है :-- अज्ञानता-वश हमारे द्वारा ; परमात्मा के सभी रूपों को ; समान भाव से आदर ना दे पाना !!
मित्रो इतना तो हम सब भली-भांति जानते हैं कि :--
परमात्मा हम सब के मूल माता-पिता हैं ; और उनके तीन रूप हैं :-- ब्रम्हा-रूप में जन्मदाता ; विंष्णु रूप में पालन-कर्ता ; और शिव-रूप में संहार-कर्ता …!! परन्तु परमात्मा के प्रथम दो रूपों ; जन्मदाता और पालन-कर्ता को तो हम सभी कल्याण-कारी मानते हैं ; उनके इन रूपों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त करते हैं !! पर हम परमात्मा के तीसरे संहारक रूप को ; कल्याणकारी नहीं मान पाते ? उनके इस संहारक रूप के प्रति ; कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर पाते ?
जैंसे ही जीवन में ;
हमारी समझ से प्रतिकूल कोई प्रसंग आया ; उसे अकल्याणकारी समझ ; कष्ट के रूप में रूपांतरित करने में हम ; देर नहीं लगाते !! यह ऐंसे ही है जैंसे ; बालपन की अबोध-अवस्था में हमारा ; अपने माता-पिता-गुरुजनों आदि की डाँट/दंड को ; अकल्याणकारी समझ ; छुब्ध हो जाना !!
परन्तु जब हमें समझ आती है ;
अर्थात जब हम बड़े होने पर माता-पिता-गुरुजनों की मनोदशा से एक-रूप होते हैं ; तो समझ में आता है कि :-- उनकी डांट/दंड भी हमारे लिए समान रूप से कल्याणकारी थी !! अर्थात ; अबोध-अवस्था में छुब्ध हो जाना ; हमारी नासमझी थी !!
इसी तरह मित्रो ;
जिस दिन हम परमात्मा के तीसरे रूप ; अर्थात शिव/संहारक के भी समान रूप से उपासक बनते हैं ; अर्थात कष्ट-जन्य परिस्थिति आने पर अपनी मनः स्थिति को शांत बनाये रखते है ; अपना विवेक नहीं खोते ; उसी दिन से ही हम सही मायनों में ; धार्मिक बनते हैं !! क्योंकि उसी दिन से हम परमात्मा के मनो-भावों से एक-रूपता स्थापित करते हैं !! और वैकुण्ठ भाव ; अर्थात कुंठा-रहित ह्रदय ; या निर्भयता का जीवन जीना प्रारम्भ करते हैं !!
अतः ;
निर्भयता से जीवन जीना ? या ना जीना ? यह हमारा व्यक्तिगत निर्णय है मित्रो !!
क्या उपरोक्त से सहमत हैं मित्रो ?
******** ॐ कृष्णम् वन्दे जगत गुरुम् ********

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