बुधवार, 31 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८४ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= विन्दु ८४ =** 

**= भ्रम नाशक उपदेश =** 
राजा रायसिंह को उक्त प्रश्न किस देव की पूजा करते हो का उत्तर देते हुये उसका भ्रम दूर करने का परमशांत परमदयालु संत प्रवर दादूजी ने यह पद बोला - 
"जग अंधा नैन न सूझे, 
जिनके सिरजे ताहि न बूझे ॥ टेक ॥ 
पाहण की पूजा करै, कर आतम घाता । 
निर्मल नैन न आव ही, दोखज दिशि जाता ॥ १ ॥ 
पूजैं देव दिहाड़िया, माहामाई मानैं । 
परकट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ॥ २ ॥
भैरूं भूत सब भरम के, पशु प्राणी ध्यावैं । 
सिरजनहारा सबनका, ताको नहिं पावैं ॥ ३ ॥ 
आप स्वारथ मेदनी, का का नहिं करहीं । 
दादू सांचे राम बिन, मर मर दुख भरहीं ॥ ४ ॥"
उपास्य संबंधी भ्रम दूर कर रहे हैं - जगत् के प्राणी अज्ञान से अन्धे हो रहे हैं, उनके नेत्रों से उनका हित अनहित भी नहीं दीखता और जिस प्रभु ने उन्हें उत्पन्न किया है, उसको भी वे नहीं समझ पाते हैं । इसलिए पत्थर की पूजा करते हैं और बलि देने के निमित्त बकरे आदि का घात करते हैं । निर्मल साधन इनकी दृष्टि में नहीं आता है अर्थात् नहीं करते हैं । इसी कारण नरक की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं । भैरूं आदि देवताओं को पूजते हैं । महामाई को मानते हैं और बुरी दशा को प्राप्त होते हैं किन्तु जो सब विश्व में प्रकट निरंजन देव हैं, उनकी भक्ति करना नहीं जानते हैं । भैरूं भूतादि सब भ्रम मय हैं । पशुवों के समान प्राणी ही उनकी उपासना करते हैं । इसीलिए सर्व विश्व के रचियता जो प्रभु हैं, उन्को न प्राप्त होकर जन्मादि प्रवाह में ही बहते हैं । अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये पृथ्वी के प्राणी क्या - क्या नहीं करते है ? सभी कुछ कर डालते हैं किन्तु सत्य स्वरूप राम की उपासना बिना बारंबार मर - मर के जन्मते हैं और नाना क्लेश भोगते हैं । 
(क्रमशः)

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