बुधवार, 31 अगस्त 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (तृ.उ. २/३) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश**
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*= योगसाधना के लिये उचित स्थान =*
*प्रथम सु धर्म देश कहुं ताकै ।*
*भलौ राज्य कछु दखल न जाकै ।* 
*तहां जाइ कै मठिका करई ।*
*अल्प द्वार अरु छिद्रसु भरई ॥२॥*
(अब गुरुदेव योगसाधना के लिये उपयुक्त स्थान का वर्णन करते हैं -) साधक को योगक्रिया के लिये ऐसा देश चुनना चाहिये जहाँ धार्मकि समाज का बहुमत हो, उस देश का राजा ऐसा हो जो प्रजा की सामाजिक, धार्मिक क्रियाओं में हस्तक्षेप न करता हो, जिसका राज्य शान्त तथा शत्रुपक्ष से निष्कण्टक हो । ऐसे देश में जाकर योगी को एकान्त स्थान में मठ(रहने का स्थान) बनाना चाहिये, जो बहुत अधिक खिड़की व दरवाजेवाला न हो ॥२॥
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*लिप्त करै चाहुं ओर सुगंधा ।*
*कूप सहित मठ इहिं बिधि बंधा ।* 
*तामहिं पैठि करै अभ्यासा ।*
*गुरु गमि हठ करि जीतै स्वासा ॥३॥* 
उसकी दीवारों पर चारों ओर सुगन्धित लेप कर देना चाहिये, ताकि प्राणायाम की क्रियाओं के समय दुर्गन्ध वायु न फैले । मठ के एक किनारे पर जल इत्यादि की सुविधा के लिये एक कूआ भी बनाना चाहिये, ताकि यथासमय स्नान, शुद्धि आदि में कोई बाधा न पड़े । ऐसे मठ में बैठ कर गुरु के दिये हुये उपदेश और ज्ञान के अनुसार ही योगक्रिया(प्राणायाम) का अभ्यास करना चाहिये ।(क्योंकि यह योगक्रिया एकान्ततः गुरुपदेश के बिना अतीव कष्ट-साध्य है ।) ॥३॥ 
(क्रमशः)

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