मंगलवार, 30 अगस्त 2016

= परिचय का अंग =(३४/६)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
श्री दादू अनुभव वाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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साधू जन क्रीड़ा करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव ।
चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥३४॥
जिसमें देव, दानव, नाग, नर आदि सँपूर्ण सँसार के प्राणी बसते हैं, उस ईश्वर रूप ग्राम के शुद्ध ब्रह्म रूप स्थान में सँतजन अभेद चिन्तन रूप क्रीड़ा करते हुये निरँतर ब्रह्मानन्द में निमग्न रहते हैं । मैं उस शुद्ध ब्रह्म रूप स्थान की बलिहारी जाता हूं । हे जिज्ञासु ! तू भी निदिध्यासन द्वारा उसी में चल । वही नित्यानन्द स्वरूप है । जगत दु:खमय है ।
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दादू पसु१ पिरँनि२ के, पेही३ मँझि कलूब४ ।
बैठौ आहे बीच में, पाण५ जो महबूब६ ॥३५॥
जो सँसार बन्धन से मुक्त करने वाले, अपने५ आत्म स्वरूप प्रेम - पात्र६ स्वामी३ हैं, वे तेरे शरीर के मध्य हृदय४ में ही स्थित हैं, उन परम - प्रिय२ परमेश्वर के वास्तव स्वरूप को देख१ ।
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नैनहुं वाला निरख कर, दादू घालै हाथ ।
तब ही पावे राम - धन, निकट निरंजन नाथ ॥३६॥
आत्मानात्म विवेक - नेत्र वाला जिज्ञासु अनात्म रूप सँसार को मिथ्या देखकर, सत्य - स्वरूप आत्मा की ओर अन्त:करण - वृत्ति रूप हाथ डालता है अर्थात् आत्मा में वृत्ति स्थिर करता है, तब ही निदिध्यासन द्वारा ज्ञान - नेत्र की ज्योति बढ़ाकर विश्व के स्वामी माया रहित राम रूप धन को अत्यन्त समीप, आत्म स्वरूप से प्राप्त करता है ।
(क्रमशः)

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