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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= अथ विन्दु ८४ =**
दादूजी ने राजा रायसिंह को यह पद बोला -
**= निज पंथ का स्वरूप =**
"भाई रे ऐसा पंथ हमारा,
द्वै पख रहित पंथ गह पूरा, अवरण एक आधारा ॥ टेक ॥
वाद विवाद काहू से नांहीं, मांहिं जगत तैं न्यारा ।
सम दृष्टि स्वभाव सहज में, आपहि आप विचारा ॥ १ ॥
मैं तैं मेरी यहु मति नांहीं, निर्वेरी निरकारा ।
पूरण सबहि देख आपा पर, निरालम्ब निरधारा ॥ २ ॥
काहू के सँग मोह न ममता, संगी सिरजनहारा ।
मन ही मन से समझ सयाना, आनन्द एक अपारा ॥ ३ ॥
काम कल्पना कदे न कीजे, पूरण ब्रह्म पियारा ।
इहिं पंथ पहुँच पार गह दादू, सो तत सहज संभारा ॥ ४ ॥"
हे भाई ! हमारा पंथ तो ऐसा है - उसमें एक ही ब्रह्म का ही आधार रहता है, किन्तु हिन्द्दु, मुसलमान पना आदि द्वैत पक्ष नहीं होता है । न वर्ण विभाग ही है । उसको जो ग्रहण करता है, वह पूर्णब्रह्म को प्राप्त होकर, स्वयं भी पूर्ण ही हो जाता है । उसमें किसी के वाद विवाद करने की आवश्यकता नहीं रहती है । उसका पथिक जगत् में रहकर भी जगत् से अलग ही रहता है । सहज स्वभाव ही उसमें समदृष्टि रहती है तथा अपने आप ही आत्म स्वरूप का विचार करता है । "मैं, तू, मेरी, तेरी ।" यह भेद बुद्धि उसमें नहीं रहती है । वह सबसे निर्वेर होकर, अपने पराये सब में निराकार, निरालम्ब, पूर्णब्रह्म को निश्चय पूर्वक देखकर सम हो जाता है । किसी के साथ मोह, ममता नहीं करता है । परमात्मा को ही अपना साथी समझता है तथा वह बुद्धिमान् विचार द्वारा अपने मन ही मन में समझकर अपार अद्वैतानन्द को प्राप्त होता है । अतः सांसारिक कामना युक्त कल्पना कभी भी मत कर और इस उक्त मार्ग के द्वारा संसार के पार पहुँचकर परम प्रिय पूर्णब्रह्म को अद्वैतात्म रूप से ग्रहण कर । वही परब्रह्म तत्त्व हमने सहज समाधि में देखा है ।
(क्रमशः)

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