卐 सत्यराम सा 卐
ना हम छाड़ैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार ।
मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥
सहज शून्य मन राखिये, इन दोन्यों के मांहि ।
लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥
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साभार ~ Anand Nareliya
एक आदमी आया बुद्ध के पास, भर दुपहरी थी, और उसने आकर बुद्ध को कहा कि मेरे कुछ प्रश्न हैं और मैं पूछना चाहता हूं;मैं ज्यादा देर ठहर भी नहीं सकता, मैं जल्दी में हूं —और जल्दी में तो सभी हैं, समय भागा जा रहा है, कल का भरोसा नहीं है। इसलिए आप टालना मत, मुझे उत्तर अभी चाहिए। और यह भी आप से निवेदन कर दूं कि मुझे शब्दों में उत्तर नहीं चाहिए, मुझे तो आप असली चीज कह दें, असली चीज दिखा दें, एक झरोखा खोल दें; एक झलक हो जाए, दरस—परस करवा दें। और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
बुद्ध ने आखें बंद कर लीं। आनंद जो उनके पास बैठा था बड़ा हैरान हुआ कि अब यह मामला कैसे हल होगा? यह आदमी कहता है —शब्द में कहें मत, दरस—परस करवा दें! हमें सुनते—सुनते वर्षो हो गये तब दरस—परस नहीं हुआ और यह इतनी जल्दी मे है! अधैर्य की भी एक सीमा होती है! और बुद्ध कुछ क्षण चुप रहे, फिर उन्होंने आंख खोली, उस आदमी ने झुककर चरण छुए और कहा—आप की बड़ी अनुकंपा है। मैं धन्यभाग! आप ने बड़ी कृपा की मैं किन शब्दों मे धन्यवाद करूं? याद रखूंगा यह क्षण। यह भूले न भूलेगा। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी संपदा है। यह मेरे भीतर दीये की तरह जलेगा। मौत के क्षण में भी यह मेरे साथ होगा। मैं अनुगृहीत हूं। और वह आदमी झुकता है और झुकता है और झुकता है।
आनंद और चकित होता है।
उसके जाते ही वह बुद्ध से पूछता है—यह मामला क्या है? हुआ क्या? मैं भी बैठा था, मुझे तो कोई दरस—परस नहीं हुआ। कुछ दिखायी भी नहीं पड़ा, कुछ… और आप ने कुछ कहा भी नहीं, आप आंख बंद करके बैठ गये, वह आदमी बैठा रोता रहा, और इतनी जल्दबाजी में लेन—देन हो गया! न इस हाथ से उस हाथ में कुछ चीज गयी, न कुछ मुझे दिखायी पड़ा, और मैं भर अकेला यहां था जो ठीक—ठीक आंख खोले बैठा था—आप भी आंख बंद किये थे, उस आदमी की आखें भी आधी बंद थीं। बुद्ध ने कहा—आनंद, मुझे याद है भलीभांति… आनंद बुद्ध का चचेरा भाई था, दोनों साथ—साथ बड़े हुए थे—आनंद बड़ा भाई था—साथ—साथ खेले थे, साथ—साथ घुड़सवारी की थी, शिकार किये थे, साथ—साथ गुरुकुल में रहे थे… बुद्ध ने कहा मुझे भलीभांति पता है आनंद, बचपन में तुझे घोड़ों का बड़ा शौक था, इसलिए तुझे उसी प्रतीक मे कहता हूं—
ऐसे घोड़े होते हैं कि मारो और मारो तो भी चलते नहीं। आनंद ने कहा—यह बात सच है। ऐसे घोड़े मैं जानता हूं। और ऐसे भी घोड़े होते हैं आनंद, कि मारो तो चलते हैं, न मारो तो नहीं चलते। और ऐसे भी घोड़े होते हैं आनंद, कि मारने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ कोड़ा फटकारना पड़ता है। और ऐसे भी घोड़े होते हैं आनंद कि कोड़ा फटकारना भी नहीं पड़ता, कोड़े की मौजूदगी काफी है। और तूने ऐसे भी घोड़े शायद देखे होंगे कि कोड़े की मौजूदगी की भी जरूरत नहीं, कोड़े की छाया काफी है। ऐसे कुलीन घोड़े भी होते हैं कि कोड़े की छाया काफी है। आनंद ने कहा—यह बात मेरी समझ में आती है। वह तो भूल ही गया इस आदमी को, वह तो घोड़ों की बात उसकी समझ मे आयी—घोड़ों का प्रेमी था। बुद्ध ने कहा—यह ऐसा ही घोड़ा था, इसको सिर्फ छाया काफी है;फटकारना भी नहीं पड़ा, कोड़ा दिखाना भी नहीं पड़ा, सिर्फ छाया। इधर मैंने आंख क्या बंद कीं कि उधर उसने आखें खोल लीं। लेन—देन हो गया है। मौन ही मौन में हो गया है। यह संतरण मौन है।
तो ऐसे लोग हैं जो मौन मे समझ लेंगे। मगर बहुत विरले हैं ऐसे लोग। फिर जो लोग मौन में समझ लेंगे, उनके लिए किसी के द्वारा बताया जाना आवश्यक नहीं है। अगर यह आदमी बुद्ध के पास न आता, तो भी समझकर ही मरता। यह आदमी बिना समझे नहीं मर सकता था। हो सकता था किसी वृक्ष के पास बैठकर समझ जाता—क्योंकि वृक्ष भी मौन हैं। और हो सकता था किसी पहाड़ की कंदरा में बैठकर समझ जाता—क्योंकि पहाड़ भी मौन हैं। और हो सकता था चांद को देखकर समझ जाता—क्योंकि चांद भी मौन है। यह आदमी देर—अबेर समझ ही जाता। बुद्ध के पास आने से चलो घटना जल्दी घट गयी। मगर यह आदमी समझता तो जरूर। जो इतने जल्दी समझ गया, जो इतनी त्वरा से समझा, इतनी तीव्रता से समझा, इसके भीतर गहन प्यास थी। यह आदमी निन्यानबे डिग्री पर उबलता हुआ पानी था। जरा सा धक्का कि सौ डिग्री हो गया और उड़ गया। शायद बुद्ध के पास न आता तो दो—चार साल लग जाते—या दो—चार जन्म—लेकिन क्या मूल्य है दो—चार जन्मों का भी इस लंबे विस्तार में? दो पल से ज्यादा मूल्य नहीं। मगर यह पहुंच तो जाता।
शांडिल्य कहते है—ऐसे लोग हैं जो मौन से समझ लेंगे। मगर वे तो विरले है। जो कोड़े की छाया से चलेंगे ऐसे घोड़े तो विरले है। अधिक तो ऐसे हैं जिन्हें शब्दों की जरूरत होगी। फिर शब्दों के मारे—मारे भी कहां चलते है? उनके लिए कहना होगा, उनके लिए बोलना होगा। और वे ही बहुमत में हैं, जो शब्दों से भी कहने पर नहीं समझ पाएंगे। जो शब्दों से कहने पर नहीं समझ पाते, वे मौन को तो कैसे समझेगे? इसलिए बुद्धियां अलग—अलग प्रकार की हैं।
ओशो

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