सोमवार, 1 अगस्त 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. ४३/४) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् करि पर्वत हिं निवासा ।*
*पुनि सो करहिं गुफा मैं वासा ।*
*केचित् एक ठौर न रहांहीं ।*
*आजु सु इहां काल्हि उहां जांहीं ॥४३॥* 
कुछ लोग पर्वतों पर जाकर रहनें में, कुछ लोग उन पर्वतों की गुफाओं में वास करने में अपना भला मानते हैं । कुछ लोग एकान्तवास के इतने आदी हो जाते हैं कि वे आज यहाँ कल वहाँ रहने में ही परम पद मान बैठते हैं, और अपना अन्य कोई कर्तव्य कर्म नहीं मानते ॥४३॥ 
*केचित् तृण की सेज बनावैं ।*
*केचित् लै कंकरा विछावैं ।*
*केचित् ब्रत हिं गहैं अति गाढे ।*
*द्वादश वर्ष रहै पग ठाढे ॥४४॥* 
कुछ लोग घास-पात की सेज पर सोने में ही मोक्ष पाना समझ लेते हैं । कुछ अपने शयन-स्थान पर कंकर-पत्थर बिछाकर उन्हीं पर सोकर शरीर को कष्ट देकर परम पद की प्राप्ति का भ्रम पाले रहते हैं । कुछ लोग मोक्ष पाने के लिये अत्यन्त कठोर व्रतों(नियमों) का आचरण करते हैं । यहाँ तक कि कुछ लोग १२ वर्ष तक पैरों पर खड़े के खड़े रह जाते हैं, न बैठते हैं, न लेटते हैं, न आराम करते हैं ॥४४॥
(क्रमशः)

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