🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*योगचतुष्टय की महिमा-*
*भक्ति मंत्र लय कीनी चरचा ।*
*समझै सन्त करै जो परचा ।*
*एक किये तिहुं लोक बड़ाई ।*
*चार्यौं की कछु कही न जाई ॥५०॥*
इस तरह हमने भक्तियोग, मन्त्रयोग, लययोग तथा चर्चायोग का संक्षेप से वर्णन कर दिया है । इन योगों के विषय में तत्त्वतः वही सन्त-महात्मा जान सकता है जो इनका तल्लीनता से अभ्यास करते हुए अनुभव करने का प्रयास कर रहा हो । इनमें से किसी एक योग का अभ्यास भी यथार्थतया कोई कर ले तो वह बड़ा भाग्यशाली है, यदि किसी को चारों योग हस्तामलक हो जायँ तो उसका कहना ही क्या है ! ॥५०॥
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*- दोहा -*
*ये चार्यौं अंग भक्ति के, नौधा इनहीं मांहि ।*
*सुन्दर घट महिं कीजिये, बाहरि कीजै नांहि ॥५१॥*
इति श्रीसुन्दरदासविरचितायां सर्वांगयोगप्रदीपिकायां भक्तियोग-नामा द्वितीयोपदेशः ॥२॥
इस तरह हमने इन भक्तियोग के अन्तर्गत चारों योगों का व्याख्यान कर दिया । नवधा भक्ति भी इन्हीं के अन्तर्भूत है । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं—इस नवधा भक्ति का अभ्यास बाहर के मठ-मन्दिरों में बैठकर नहीं, मानसोपचार विधि से अन्तर्मन के द्वारा ही करना चाहिये । इसी में साधक का कल्याण है ॥५१॥
= श्री स्वामी सुन्दरदासजी द्वारा रचित सर्वांगयोगप्रदीपिका ग्रन्थ का भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश समाप्त =
(क्रमशः)

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