सोमवार, 29 अगस्त 2016

= परिचय का अंग =(३१/३)


॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी टीका** ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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जहं तन मन का मूल है, उपजै रव१ ओंकार ।
अनहद सेझा शब्द का, आतम करे विचार ॥३१॥
जहां स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर का मूल कारण अज्ञान है, जहां ॐ की ध्वनि१ प्रकट होती है, जो अनाहत शब्दों का उद्गम स्थान है, जिज्ञासु जन जहां विचार द्वारा आत्मा के सामान्य रूप को अज्ञान के प्रकाशक रूप से देखते हैं ॥३१॥ 
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भाव भक्ति लै ऊपजै, सो ठाहर निज सार ।
तहं दादू निधि पाइये, निरन्तर निरधार ॥३२॥
जहां से भाव अर्थात् सँपूर्ण त्रिपुटियों की उत्पत्ति होती है और लै अर्थात् सँपूर्ण त्रिपुटियाँ जहां लीन होती हैं, भक्ति अर्थात् अनुराग वृत्ति का भी जहां से सूक्ष्म रूप निकलता है, वही मणि - पूरक चक्र(नाभि कमल) विश्व के सार स्वरूप अपने आत्मा की अनुभूति का स्थान है । उसी में सँपूर्ण आधारों से रहित, निराधार, सदा एक रस रूप, और सँपूर्ण सँसार प्रलय काल में जिसमें अन्तर्हित रूप से रहता है, वह परमात्मा रूप निधि आत्मरूप से प्राप्त होती है ॥३२॥ 
विशेष विवरण - सुषुप्ति अवस्था में पुरितत् नामक नाड़ियों के जाल नाभि स्थान में ही "कुछ नहीं जान सका" ऐसी अज्ञान की प्रतीति होती है । ढाई वर्ष तक नाभि स्थान पर ॐ का ध्यान करने से वहां ही ओंकार - ध्वनि प्रकट होती है और शाँत - ध्वनि एकान्त स्थान में रात्रि के समय नाभि स्थान पर घड़ी की आवाज के समान साधक को कट - कट रूप से सुनाई पड़ती है ।
अनाहत शब्द प्रकट रूप से तो अनाहत चक्र में ही सुनाई पड़ते हैं किन्तु निकलते नाभि स्थान से ही हैं, नाभि ही उनका सेझा(उद्गम स्थान) है । आत्मा के सामान्य रूप का अनुभव सुषुप्ति में "सुख से सोया" के रूप में नाभि - कमल में ही होता है । सुषुप्ति समाप्त होने पर ही नाभि - कमल से त्रिपुटी रूप भाव व्यक्त होते हैं और सुषुप्ति के आरँभ में नाभि - कमल में ही लय होते हैं । सुषुप्ति में भक्ति का भी सँस्कार ही रहता है और सुषुप्ति समाप्ति पर ही भक्ति प्रकट रूप से भासती है ।
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एक ठौर सूझै सदा, निकट निरँतर ठाँव ।
तहां निरंजन पूरि ले, अजरावर तिहिं नाँव ॥३३॥
देवताओं से भी अति श्रेष्ठ होने के कारण उन परमात्मा का नाम अजरावर है । उनका विशेष रूप से निरँतर निवास स्थान अनाहत चक्र के समीप अष्टदल कमल है । ध्यानावस्था में सदा एकमात्र अष्टदल कमल पर ही उनका साक्षात्कार होता है । वहां ही अपनी अन्त:करण की वृत्ति को स्थिर करके माया रहित परब्रह्म का साक्षात्कार कर ले ॥३३॥
(क्रमशः)

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