🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
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*तूं जु अगाध अपार सु देवा ।*
*निगम नेति जानैं नहिं भेवा ।*
*तेरा को करि सकै बखाना ।*
*चकित भये सब संत सुजाना ॥४८॥*
हे देव, आप तो अगाध(गम्भीर) हैं, अपार हैं । आप के लिये तो वेदशास्त्र भी(आप के रहस्य के विषय में निश्चित जानकारी न होने पर) ‘नेति, नेति’ कह कर चुप हो बैठे । आपको ‘इदमित्थम्’ कह कर निश्चयपूर्वक कौन कह सकता है ? यहाँ तक कि सब ज्ञानी सन्त-महात्मा भी, जो दिन-रात आप के ही ध्यान में लगे रहते हैं वे भी, आप का वर्णन करने में थक गये ॥४८॥
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*तेरी गति तूं ही पै जानैं ।*
*मेरी मति कैसै जु प्रवानैं ।*
*कीरी पर्वत कहा उचावै ।*
*उदधि थाह कैसैं करि आवै ॥४९॥*
आप अपना रहस्य स्वयं ही जानते हैं, मुझ मन्दगति की क्या मजाल है कि आपके विषय में सप्रमाण कुछ कह सकूँ ! कभी चींटी ने पर्वत की ऊँचाई का सही वर्णन किया है, या कोई आज तक समुद्र की गम्भीरता का ठीक-ठीक पता लगा पाया है ! ॥४९॥
(क्रमशः)

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