रविवार, 28 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८४ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= अथ विन्दु ८४ =**
**= खाटू पधारना =** 
दूसरे दिन शिष्यों के सहित दादूजी पत्रवाहक के साथ ईडवा से खाटू को चले और शनैः शनैः ब्रह्मचिन्तन करते हुये खाटू पहुँच गये । किन्तु पीछे से एक गोकुलिये गुसांइयों का शिष्य जिसका नाम आत्मबिहारी ने फत्तू लिखा है । वह जाति से ब्राह्मण था । उसको जब ज्ञात हुआ कि राजा ने दादूजी को बुलाया है । तब उसने राजा से कहा - आपने दादू को क्यों बुलाया है ? उसके साथ और भी साधु होंगे । यह व्यर्थ का खर्च शिर पर क्यों लिया है ? राजा ने कहा - बहुत अच्छे महात्मा हैं, मेरे काका भीमसिंह(बड़े सुन्दरदासजी) भी उनके शिष्य हैं । उसने कहा - दादू में अच्छापना कुछ नहीं है । अच्छेपने का केवल प्रचार करके उसके शिष्य भोले लोगों को ठगते हैं । तुम्हारे काका उसके शिष्य हो गये तो क्या हुआ । एक ने भूल की हो तो क्या उसके पीछे वाले सब भूल करते रहैं ? यह कोई बुद्धिमानी की बात है क्या ? आपको यह भूल नहीं करनी चाहिये थी, इससे तो यहाँ के लोग और बिगड़ेंगे । दादू में क्या अच्छापन है । अच्छापन तो उसने त्याग दिया है और उसके संग में जाते हैं, वे भी अच्छापन को त्याग देते हैं । राजा ने पूछा - वह कौन सा अच्छापन है जिसको दादूजी ने त्यागा है और उनके संग से अन्य लोग भी त्याग देते हैं ? उसने कहा - दादू ने भक्तों के मुख्य चिन्ह माला तिलक त्याग दिये हैं मूर्तिपूजा नहीं करता है, पूरा - पूरा नास्तिक है । इस से बुरा और क्या होगा जो साधु कहलाकर भी माला, तिलक, कंठ तथा शिर पर धारण नहीं करे । इत्यादिक बहुत - सी अंडबंड बातें सुनाकर राजा को बहका दिया । अंत में राजा ने कहा - अब तो बुला लिये इससे यदि वे आ गये तो उन के पास जाना तो पड़ेगा ही । उसने कहा - अनादर कर देना चाहिये । अनादर होगा तब अपने आप ही यहां से चला जाएगा । 
इधर पत्र वाहक ने जाकर राजा को सूचना दी दादूजी आ गये हैं । तब राजा ने दादूजी को अपने पास बुलाने की बात कहकर अर्थात् यहां बुला लाओ कहकर राजा ने कहा - वे यहां क्यों नहीं आये ? पत्र वाहक ने कहा - वे महात्मा हैं, उनके कोई इच्छा तो है नहीं । राजा महाराजाओं के पास तो कोई इच्छा लेकर जाते हैं । राजा ने कहा - इच्छा नहीं थी तो यहां तक कैसे आये ? पत्र वाहक ने कहा आपकी प्रार्थना से हम लोगों पर दया करके आये हैं । फिर श्रद्धा कम हो जाने से राजा ने दादूजी को अपने पास ही बुलवाया और विशेष स्वागत सत्कार न करके ही दादूजी से प्रश्न पूछने का विचार किया । वह की दादूजी की अवस्था को तो जानता ही नहीं था । फिर बहकाने से और भी अधिक भ्रम में पड़ गया था । इसलिये मन में यह सोचकर कि मैं पूछूंगा, उन प्रश्नों के उत्तर उनको आयेंगे नहीं तब आप ही अनादर हो जायगा । फिर जैसा उसने सोचा था वैसा ही किया । दादूजी के आने पर उनका समादर न करके । 
(क्रमशः)

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