॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= अथ परिचय का अँग ४ =**
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विरह की अन्तावस्था में ध्येय का साक्षात्कार होता है । अत: अब साक्षात्कार सम्बन्धी विचार रूप परिचय का अँग कहने में प्रवृत्त हुये प्रथम मँगल कर रहे हैं –
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दादू नमो नमो निरंजनँ, नमस्कार गुरुदेवत: ।
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥
जिनकी कृपा से साधक विरह - व्यथा से पार होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है, उन निरंजन राम, सद्गुरु और सब सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं ।
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दादू निरँतर पिव पाइया, तहं पँखी उनमनि जाइ ।
सप्तों मँडल भेदिया१, अष्टैं रह्या समाइ ॥२॥
२ - १७ में साक्षात्कार सम्बन्धी वार्ता कह रहे हैं - साधन - पक्षों वाला जीवात्मा - पक्षी समाधि में जाकर जिस निर्विकल्प स्थिति में परब्रह्म को प्राप्त करता है, उस परब्रह्म को हमने अन्तर - रहित(वृत्यन्तर के व्यवधान से रहित) सदा के लिए प्राप्त कर लिया है । वह पँचमहाभूत, अहँकार और माया इन सप्त मँडल में व्याप्त होकर भी इनसे आगे अपनी महिमा रूप अष्टम मँडल में रहता है अर्थात् मायिक प्रपँच में रहकर भी उससे अलग ही है । अन्य अर्थ - समाधि में जाकर जीवात्मा - पक्षी सप्त धातु से बने हुये शरीर - मँडल की आसक्ति, स्वर्गादिक ऊपर से सप्त लोकों की भोगासक्ति तोड़ता१ है चार अन्त:करण और तीन गुणों की मर्यादा से आगे बढ़ता है सप्त अज्ञान भूमिका: और मूलाधारादि सप्त चक्रों को भेदन करता है तब अष्टम ब्रह्म में अभेद होता है । उस ब्रह्म को हमने अनात्माकार वृत्तियों के अन्तराय से रहित निरँतर प्राप्त कर लिया है ।
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दादू निरँतर पिव पाइया, जहं निगम१ न पहुंचे वेद ।
तेज२ स्वरूपी पिव बसे, कोइ विरला जाने भेद३ ॥३॥
जिन ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप तक शब्द रूप होने से वेद भी शक्ति वृत्ति द्वारा नहीं पहुंच सकता । उस ब्रह्म को सँशय - रहित१ सदा के लिए हमने प्राप्त कर लिया है । वे नित्य ज्ञान२ स्वरूप प्रियतम सब में बसते हैं किन्तु उनके स्वरूप रहस्य३ को कोई विरला ज्ञानी सँत ही जानता है ।
(क्रमशः)

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