सोमवार, 15 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= बग्घा को उपदेश =*
एक दिन ईडवा के तालाब के तट पर वट वृक्ष के नीचे दादूजी महाराज विराजे थे । उसी समय भक्त वर नरवद के पुत्र बग्घा आये और दादूजी को सत्यराम बोलकर साष्टांग दंडवत की फिर हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा लेकर दादूजी के सामने बैठ गये ।
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दादूजी ने उनको उस स्थित में बैठे देखकर उनके अधिकारानुसार उपदेश करने के लिये यह पद बोला -
"गुरु मुख पाइये रे ऐसा ज्ञान विचार,
समझ समझ समझ्या नहीं, लागा रंग अपार ॥टेक॥
जाँण जाँण जांण्या नहीं, ऐसी उपजे आय ।
बूझ बूझ बूझ्या नहीं, ढोरी१ लागा जाय ॥१॥
ले ले ले लिया नहीं, हौंस२ रही मन माँहिं ।
राख राख राख्या नहीं, मैं रस पीया नांहिं ॥२॥
पाय पाय पाया नहीं, तेजैं तेज समाय ।
कर कर कुछ कीया नहीं, आतम अंग लगाय ॥३॥
खेल खेल खेल्या नहीं, सन्मुख सिरजन हार ।
देख देख देख्या नहीं, दादू सेवक सार ॥४॥
अरे भाई ! गुरुजनों के मुख से ही ऐसा ज्ञान - विचार सुनने में आता है कि- उस परब्रह्म का अपार प्रेम - रंग लग गया है, किन्तु शास्त्र संतों द्वारा उसे बारंबार समझकर भी उसका आदि, मध्य, अन्त नहीं समझ सके हैं ।
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उसे व्यापक तथा अपना स्वरूप जानकार भी बुद्धि में ऐसी भावना उत्पन्न होती रहती है कि - अभी पूर्णरूप में नहीं जाना गया है । उसके विषय में बारंबार प्रश्न करके भी अभी तक न पूछने के समान भावना होती रहती है और संत ब्रह्माकार वृती द्वारा लगन१ पूर्वक उसकी ओर आगे बढ़ता रहता है ।
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मन, वचन, कर्म से उसकी प्राप्ति होने का निश्चय कर लेने पर भी नहीं प्राप्त करने की सी स्थिति प्रतीत होती रहती है और प्राप्त करने की इच्छा२ मन में बनी रहती है । ध्यान द्वारा हृदय में और विचार द्वारा बुद्धि में रखने पर भी नहीं रखने के समान प्रतीत होता है । कारण ? मैंने निदिध्यासन रूप अखंड रस का पान नहीं किया है ।
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उसे व्यापक रूप से तथा आत्मरूप से प्राप्त तो कर लिया है किन्तु आत्म - प्रकाश परमात्म में लय होकर व्यवहार में भी उसकी भिन्न प्रतीति नहीं हो ऐसे प्राप्त नहीं कर सके हैं । बारंबार योगादि साधन करके भी जब तक आत्मा को परमात्म स्वरूप में अभेद न कर सके हैं, तब तक कुछ भी नहीं करने के समान भावना बनी रहती है ।
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ध्यानावस्था में और सविकल्प समाधि में परब्रह्म दर्शनानन्द रूप खेल खेलकर भी जब तक ब्रह्मज्ञान द्वारा ब्रह्म के सन्मुख होकर उससे अभेद न हुआ तब तक ब्रह्मा अखंडानन्द प्राप्ति रूप खेल न खेलने के समान ही भावना बनी रहती है । निर्विकल्प समाधि में बारंबार साक्षात्कार करने पर भी नहीं देखने के समान देखने की इच्छा जिसमें बनी रहती है, वही सेवक श्रेष्ठ है । परब्रह्म के अखंड साक्षात्कारार्थ संत में अधैर्य रहता है, उसे ही इस पद में प्रकट किया है ।
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बग्घा उच्चकोटि के भक्त नरवद के पुत्र थे । उनमें भक्ति के अच्छे संस्कार थे और दोनों पिता - पुत्र ही दादूजी के अनन्य भक्त थे -
"नरवद को बग्घो अति नीको, भलो मनायो स्वामीजी को॥४६॥
(वि. १३ जनगोपाल)
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इसी से बग्घा में उक्त उपदेश का अधिकार देखकर इस प्रकार का उपदेश किया था । इससे बग्घा का हृदय भी परम प्रसन्नता को प्राप्त हुआ था । उसने प्रणाम करके कहा - स्वामिन् ! आपको धन्य है जो स्थिति मेरे मन में थी उसी को मुझे सम्यक् प्रकार समझाकर मेरा संशय नष्ट कर दिया है ।
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अब मैं समझ गया हूँ कि निर्गुणब्रह्म भक्ति ऐसी ही होती है, जैसे गंगा समुद्र में मिलकर भी जल प्रवाह रूप से प्रतिक्षण मिलती ही रहती है, वैसे ही निर्गुण ब्रह्म का भक्त निर्गुणब्रह्म में मिलकर प्रारब्ध के अंत तक मिलता ही रहता है ।
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आप जैसे गुरुदेव को प्राप्त होकर अब मैं धन्य हो गया हूँ, आपकी महिमा तो मैं क्या कहूँ आपतो ब्रह्म स्वरूप हैं और ब्रह्म की महिमा अपार है । वह किसी भी प्रकार वैखरी वाणी से पूर्ण रूप से कही नहीं जा सकती । अतः आपको प्रणाम करके संतोष मानता हूं । फिर बग्घा अपने घर को चले गये ।
(क्रमशः)


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