शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

= विरह का अंग =(३/१५१-३)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
श्री दादू अनुभव वाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विरह का अँग ३ =**
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विरहा मेरा मीत है, विरहा वैरी नांहिं । 
विरहा को वैरी कहै, सो दादू किस मांहिं ॥१५१॥
यद्यपि विरह शत्रु के सामान व्यथित करता है किन्तु वास्तव में शत्रु नहीं है, प्रत्युत हमारा तो सच्चा मित्र है । क्योंकि उससे होने वाले कष्ट का फल अखण्डानन्द रूप परमात्मा की प्राप्ति है । जो विरह को शत्रु कहता है, न जाने यह व्यक्ति किस स्थिति में है ? अर्थात भगवद् भक्त न होकर सांसारिक प्राणी ही हो सकता है ।
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दादू इश्क अलह की जाति है, इश्क अलह का अंग ।
इश्क अल्लाह वजूद है, इश्क अलह का रंग ॥१५२॥
प्रेम ही ईश्वर की जाति है, प्रेम ही उसे प्रिय है, प्रेम ही उसका देह है और प्रेम ही उसका रंग है । अकबर बादशाह ने चार प्रश्न किये थे - १ ईश्वर की जाति क्या है ? २ उसको प्रिय क्या है ? ३ उसके शरीर का आकार कैसा है ? ४ उसका रंग कैसा है ? उन्हीं का उत्तर इस साखी से दिया था ।
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साधु - महिमा
दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखन का चाव ।
तहाँ ले शीश नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥१५३॥
भगवन् और संतों का जहां चरण स्पर्श हो, उस स्थान की तथा संतों की महिमा बता रहे हैं - विरह द्वारा प्रियतम परमात्मा को प्राप्त होने पर विरही परमात्मारूप ही हो जाते हैं । अत: उन प्रियतम रूप संतों के चरण स्पर्श करने चाहिए । मुझे भी ऐसे संतों के दर्शन करने का उत्साह रहता है । जहां भी प्रभु ने और संतों ने अपने चरण रखे थे, वहां मस्तक नवाकर यहां की धूलि शिर पर धारण करनी चाहिए । दादूजी महाराज जब तक अहमदाबाद में रहे तब तक प्रतिदिन कांकरिया तालाब पर जहां उनको वृद्ध रूप में भगवन् का दर्शन हुआ था, उस भूमि को प्रणाम करने जाते थे और यह साखी बोला करते थे ।
(क्रमशः)

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