शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८२ =

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🌷🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏🌷
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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= नरवद को उपदेश =*
ईडवा में एक दिन नरवद आये सत्यराम बोलकर प्रणाम किया हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा लेकर दादूजी के सामने बैठ गये । दादूजी उनके मन की बात जान कर उन के अधिकानुसार उपदेश देने के लिये यह पद बोले -
मन मूरखा तैं क्या किया,
कुछ पीव कारण वैराग्य न लिया,
रे तैं जप तप साथी क्या दिया ॥टेक॥
रे तैं करवत काशी कद सह्या,
रे तूं गंगा मांहीं न बह्या ।
रे तैं विरहनि ज्यों दुःख ना सह्या ॥१॥
रे तूं पाले पर्वत ना गल्या,
रे तैं आप ही आप दह्या ।
रे तैं पीव पुकारी कद कह्या ॥२॥
होइ प्यासे हरि जल ना पिया,
रे तू वज्र न फाटो रे हिया ।
धिक जीवन दादू ये जिया ॥३॥
हे मूर्ख मन ! तूने प्रभु प्राप्ति के लिये कुछ भी वैराग्य धारण नहीं किया है, यह क्या प्रमाद किया है ? अरे ! तूने प्रभु के लिये जप, तप, योग साधन और दान किया है क्या ?
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तूने काशी करवत लेने का कष्ट कब सहा है ? और न गंगा में ही बहा है । न तूने वियोगिनी के समान प्रभु प्राप्ति के लिये दुःख सहा है ।
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न तू हिमाचल पर्वत के हिम में गला है । न तूने अपना अहंकार जलाया है । तूने व्यथित होकर प्रभु को ऐसे कहकर पुकारा - हे प्रभो ! दर्शन दो ।
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तीव्र प्यास युक्त होकर हरि भक्त रूप जल भी नहीं पान किया है । अरे हृदय ! इतना होने पर भी तू फटा नहीं है, तो अवश्य वज्र का ही है । हे मन ! प्रभु प्राप्ति के साधन से रहित ये जीवन के दिन धिक्कार के योग्य ही है ।
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उक्त पद रूप उपदेश सुनकर नरवद का जीवन ही बदल गया था । उन को तीव्र वैराग्य हो गया था । इससे उन्होंने राज्य को त्याग कर एक मात्र परमात्मा के भजन में ही अपना मन लगाया था । वे दादूजी की साधन पद्धति के अनुसार निर्गुण निरंजन ब्रह्म की भक्ति ही करते थे ।
(क्रमशः)


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