🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏🌷
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
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*= ईडवे पधारना =*
उन्हीं दिनों में ईडवा नरेश ने नरवद ने सुना कि संत प्रवर दादूजी महाराज आजकल मेड़ता में विराज रहे हैं । तब दादूजी महाराज को लाने के लिये नरवदजी मेड़ता गये । दादूजी महाराज का दर्शन करके अत्यन्त प्रसन्न हुये फिर सत्यराम बोलकर हाथ जोड़े हुये सामने बैठ गये ।
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फिर प्रार्थना की - स्वामिन् ! यहां से आप ईडवे पधारने की कृपा करें । मैं आप को ईडवे ले जाने के लिये आपके चरण कमलों में उपस्थित हुआ हूँ । नरवद प्रसिद्ध भक्त हुये हैं । उनकी भगवद् भक्ति प्रसिद्ध ही थी । उनका अति प्रेम देखकर दादूजी ने स्वीकृती दे दी ।
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नरवद ने चारभुजाजी के मंदिर में जाकर चारभुजा के दर्शन किये और कृष्णसिंह से मिले, कृष्णसिंह ने नरवदजी का बहुत सत्कार किया । फिर दादूजी जब ईडवा को प्रस्थान करने लगे तब कृष्णसिंह, रघुनाथजी तथा अन्य सब भक्तों ने दादूजी को सत्यराम बोलकर प्रणाम किया । दादूजी ने अपने मधुर वचनों से उन सबको संतुष्ट किया ।
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फिर शिष्यगण और नरवद के साथ ब्रह्म-चिन्तन करते हुये ईडवा को चले । ईडवा पहुंचने पर नरवद ने शिष्यों सहित दादूजी को तालाब पर ठहराया और स्वयं नगर में चले गये और दादूजी ठाठ-बाट से नगर में लाने की तैयारी कराई । फिर भक्त मंडल के सहित कीर्तन करते हुये नरवद दादूजी के पास आये ।
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दादूजी महाराज को सत्यराम बोलकर सबने साष्टांग प्रणामादि किया फिर पूजा करके नरवद ने कहा - स्वामिन् ! अब आप शिष्यों के सहित नगर में पधारें । तब दादूजी महाराज ने कहा -
"काहे दादू घर रहे, काहे वन खंड जाय ।
घर वन रहिता राम है, ताही से ल्यो लाय ॥
घर वन मांहीं सुख नहीं, सुख है सांई पास ।
दादू ता से मन मिला, इनतैं भया उदास ॥
(क्रमशः)
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*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
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*= ईडवे पधारना =*
उन्हीं दिनों में ईडवा नरेश ने नरवद ने सुना कि संत प्रवर दादूजी महाराज आजकल मेड़ता में विराज रहे हैं । तब दादूजी महाराज को लाने के लिये नरवदजी मेड़ता गये । दादूजी महाराज का दर्शन करके अत्यन्त प्रसन्न हुये फिर सत्यराम बोलकर हाथ जोड़े हुये सामने बैठ गये ।
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फिर प्रार्थना की - स्वामिन् ! यहां से आप ईडवे पधारने की कृपा करें । मैं आप को ईडवे ले जाने के लिये आपके चरण कमलों में उपस्थित हुआ हूँ । नरवद प्रसिद्ध भक्त हुये हैं । उनकी भगवद् भक्ति प्रसिद्ध ही थी । उनका अति प्रेम देखकर दादूजी ने स्वीकृती दे दी ।
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नरवद ने चारभुजाजी के मंदिर में जाकर चारभुजा के दर्शन किये और कृष्णसिंह से मिले, कृष्णसिंह ने नरवदजी का बहुत सत्कार किया । फिर दादूजी जब ईडवा को प्रस्थान करने लगे तब कृष्णसिंह, रघुनाथजी तथा अन्य सब भक्तों ने दादूजी को सत्यराम बोलकर प्रणाम किया । दादूजी ने अपने मधुर वचनों से उन सबको संतुष्ट किया ।
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फिर शिष्यगण और नरवद के साथ ब्रह्म-चिन्तन करते हुये ईडवा को चले । ईडवा पहुंचने पर नरवद ने शिष्यों सहित दादूजी को तालाब पर ठहराया और स्वयं नगर में चले गये और दादूजी ठाठ-बाट से नगर में लाने की तैयारी कराई । फिर भक्त मंडल के सहित कीर्तन करते हुये नरवद दादूजी के पास आये ।
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दादूजी महाराज को सत्यराम बोलकर सबने साष्टांग प्रणामादि किया फिर पूजा करके नरवद ने कहा - स्वामिन् ! अब आप शिष्यों के सहित नगर में पधारें । तब दादूजी महाराज ने कहा -
"काहे दादू घर रहे, काहे वन खंड जाय ।
घर वन रहिता राम है, ताही से ल्यो लाय ॥
घर वन मांहीं सुख नहीं, सुख है सांई पास ।
दादू ता से मन मिला, इनतैं भया उदास ॥
(क्रमशः)

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