मंगलवार, 2 अगस्त 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (प्र.उ. ४५/६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
.
*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
.
*केचित् रहैं जाइ समसाना ।*
*हम अवधूत करहिं अभिमाना ।*
*केचित् रुंख बृच्छ तर बासा ।*
*हम काहू की करहिं न आसा ॥४५॥*
कोई शमशान पर जाकर वहाँ आराधना करने के चक्कर में पड जाते हैं । और वे उस दैहिक क्रिया से यह अभिमान पाल बैठते हैं कि ‘हम अवधूत हैं । ’ कोइ सूखे या हरे पेड़ के नीचे रहने में ही अपना जीवन-कल्याण समझते हैं । और कहते हैं कि हम इतने वैराग्यवान् हो गये कि हमें किसी चीज की चाह(वासना=तृष्णा) नहीं रह गयी है ॥४५॥
.
*केचित् मौंन गहैं नहिं बोलैं ।*
*सैन हिं सै अन्तर्गति खोलैं ।*
*केचित् चन्दन खौरि बनावैं ।*
*पग पावरी नैंन मटकावैं ॥४६॥*
कुछ लोग मौन व्रत को ही परम पद प्राप्ति का साधन मानकर मुख से कुछ भी न बोलने का ढोंग करते हैं, परन्तु संसार का सारा व्यवहार तथा अपनी आन्तरिक इच्छायें हाथ-पैर मुँह-आँख के संकेतों से चलाते हैं । कुछ लोग चन्दन का तिलक लगाकर, पैरों में खड़ाऊँ पहन कर, आँखें मटकाते हुए अपने को धार्मिक नेता बताने का ढोंग करते हैं । और कहते हैं कि इसी चर्या से मोक्ष प्राप्ति होगी ॥४६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें