卐 सत्यराम सा 卐
जिहि आसन पहली प्राण था, तिहि आसन ल्यौ लाइ ।
जे कुछ था सोई भया, कछू न व्यापै आइ ॥
तन मन अपणा हाथ कर, ताहि सौं ल्यौ लाइ ।
दादू निर्गुण राम सौं, ज्यों जल जलहि समाइ ॥
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साभार ~ Vijay Divya Jyoti
प्रतीक्षा
जीवन स्वयं की ही एक प्रतीक्षा है। जिस प्रकार एक बीज़ को प्रतीक्षा है अंकुरित होने की, नदी को सागर में मिलने की, उसी प्रकार मनुष्य भी किसी वृक्ष का बीज है और सरिता है किसी सागर की। जब भी कोई स्वयं के भीतर झाँकता है तो पाता है कि असीम और अनंत में एकाकार होने की प्यास ही आत्मा है और जो इस आत्मिक प्यास को पहचान लेता है, उसके चरण परमात्मा की तरफ बढ्ने लगते हैं क्योंकि प्यास का बोध हो जाए और हम जल स्त्रोत की ओर ना चलें, ये संभव ही नहीं है। ये कभी न हुआ है ना ही हो सकता है। जहां प्यास है, वहाँ प्राप्ति की तलाश भी है। जीवन और कुछ नहीं केवल एक अवसर है स्वयं को जानने का और जिसमें ये प्यास प्रबल हो तो यही प्यास प्राप्ति भी बन जाती है। नदियों को तो सागर खोजना पड़ता है लेकिन हमारा सागर तो हमारे भीतर है। प्रभु प्रतीक्षा में परिणत हुआ जीवन ही जीवन है शेष सब उपव्यय और निरर्थक है।

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