गुरुवार, 18 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= जीता भक्त को उपदेश =*
एक दिन ईडवा में जीता भक्त ने दादूजी से पूछा - स्वामिन् ! मैं क्या साधन करूं ? तब दादूजी ने कहा -
"दादू यहु मन सुरति समेटकर, पंच अपूठे आणि ।
निकट निरंजन लाग रहु, संग सनेही जाण॥ "
इस मन की संसार में फैली हुई वृत्तियों को एकत्र करके तथा पंच ज्ञानेन्द्रियों को विषयों से लौटा करके अष्टदल कमल पर ला, फिर व्यापक होने से अत्यन्त समीप निरंजन रामको अपना सदा का साथी और स्नेही जानकार उसी के चिन्तन में लगा रह । जीता ने प्रणाम करके स्वीकार कर लिया और उक्त उपदेश के अनुसार ही साधन करने लगा । ये १०० शिष्यों में हैं ।
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*= लाखां बाई के प्रश्न का उत्तर =*
ईडवा की एक परमात्मा की भक्त वृद्धा लाखाँबाई ने सत्संग समाप्ति पर दादूजी से पूछा - स्वामिन् ! ब्रह्म साक्षात्कार के समय की स्थिति कैसी होती है ? कृपा करके बताइये । आपको तो सब कुछ करामलकवत ज्ञात ही है । उस वृद्धा माता के प्रश्न का उत्तर परम ज्ञानी दादूदयालुजी महाराज ने इस पद से दिया था –
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"एसो खेल बन्यो मेरी माई, कैसे कहूं कुछ जान्यो न जाई ॥टेक॥
सुर नर मुनि जन अचरज आई, राम चरण को भेद न पाई ॥१॥
मंदिर मांहीं सुरति समाई, कोऊ है सो देहु दिखाई ॥२॥
मनहिं विचार करहु ल्यौ लाई, दिवा समान कहँ ज्योति छिपाई ॥३॥
देह निरंतर शून्य१ ल्यौ लाई, तहँ कौण रमे कौण सूतारे भाई ॥४॥
दादू न जाणे येह चतुराई, सोई गुरु मेरा जिन सुधि पाई ॥५॥
ब्रह्म साक्षात्कार का आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं - हे माई ! मेरी अनुभूति में राम के साक्षात्कार का ऐसा खेल बना हुआ है, उसे कहूँ भी कैसे ? कारण, वाणी से कहने का तो कुछ उपाय भी नहीं जानने में आता है ।
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देवता, साधक नर, मुनिजनादि को राम के चरणों का दर्शन करके आश्चर्य ही होता है । राम में वास्तविक स्वरूप के आदि, मध्य, अन्त का रहस्य प्राप्त नहीं होता है । हृदय - मंदिर में स्थित साक्षी चेतन में जब वृत्ति लय होती है, तब जो कोई सत्य तत्त्व है, वही दिखाई देता है ।
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मनके द्वारा साक्षी चेतन के स्वरूप का सम्यक् विचार करो फिर साक्षी चेतन में लगाओ । वृत्ति लगाओ । वृत्ति सम्यक् अन्तर्मुख होकर लगने पर आत्मा का साक्षात्कार अवश्य होगा । क्योंकि, वह दीपक ज्योति के समान भासने वाली आत्म ज्योति कहां छिप जायगी ?
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देह में अन्तःकरण के भीतर निरंतर शुद्ध१ चेतन में वृत्ति लगाईं जाती है तब हे भाई ? कौन विचरता हुआ और कौन सोता हुआ दिखाई देता है ? अर्थात् विचरनादि तो शरीर के धर्म हैं, वहां शरीर नहीं भासता है ।
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हम तो ये जो परब्रह्म के स्वरूप संबंधी विलक्षणतायें है, उनका आदि अन्त नहीं जान पाते हैं । जिसने इनके आदि अन्त का ज्ञान प्राप्त किया है, वही हमारा गुरु है अर्थात् परब्रह्म के स्वरूप की विलक्षणताओं को परब्रह्म ही जानते हैं और वे ही दादूजी के गुरु हैं ।
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यह प्रसिद्ध ही है कांकरिये तालाब पर उपदेश किया था । इसके चतुर्थ पाद में भाई ! भी आया है इससे ज्ञात होता पास बैठे हुये किसी अन्य सज्जन को भी संबोधन किया है । लाखां बाई इस पद को सुनकर ब्रह्म साक्षात्कार संबन्धी स्थिति को समझ गई और अत्यन्त प्रसन्न हुई । फिर दादूजी महाराज को प्रणाम करके अपने घर को चली गई और ब्रह्म चिन्तन में संलग्न हो गई ।
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ८२ समाप्तः
(क्रमशः)

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