॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= परिचय का अँग ४ =**
दादू काया अंतरि पाइया, त्रिकुटी केरे तीर ।
सहजैं आप लखाइया, व्याप्या सकल शरीर ॥१०॥
१० - १३ में शरीर के भीतर भगवद् उपलब्धि के स्थान और भगवान् का स्वरूप बता रहे हैं - हमने साधना द्वारा प्रथम शरीर के भीतर त्रिकुटी के तट पर (१ मन पवन बुद्धि वृत्ति की एकाग्रता पर, २ जाग्रतादि तीन अवस्था से आगे तुरीयावस्था में, ३ तीन गुणों से परे निर्गुण स्थिति में, ४ आज्ञा चक्र के ऊपर, ५ ज्ञान भक्ति वैराग्य की पूर्णावस्था में, ६ स्थूल सूक्षम कारण शरीर से परे, ७ धारणा ध्यान सविकल्प समाधि से परे ८ ज्ञान की तीन भूमिकाओं से आगे चतुर्थ भूमिका में, ९ श्रवण मनन निदिध्यासन की परिपाकावस्था में) परब्रह्म को प्राप्त किया है । पश्चात् उस त्रिकुटी केन्द्र से स्वाभाविक ही हमें सँपूर्ण शरीर में व्यापक रूप भासने लगे थे ।
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दादू काया अंतरि पाइया, निरन्तर निरधार ।
सहजैं आप लखाइया, ऐसा समर्थ सार ॥११॥
हमने जो ब्रह्म शरीर के भीतर प्राप्त किया है, वह सदा एक रस, सँपूर्ण मायिक आधारों से रहित माया और मायाकृत अखिल प्रपँच का आधार, इच्छा मात्र से जगत् का सृजन, पालन, लय करने की सामर्थ्य सँपन्न और सँसार का सार तत्व है । हमारी अन्त: साधना की परिपाकावस्था में हमें अनायास ही ब्रह्म का ऐसा साक्षात्कार हुआ है ।
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दादू काया अंतरि पाइया, अनहद वेणु बजाइ ।
सहजैं आप लखाइया, शून्य मँडल में जाइ ॥१२॥
शरीर के भीतर ब्रह्मरन्ध्र में प्राण जाने पर अनाहत ध्वनि रूप वँशी बजती है, उसे बजाकर अर्थात् नादानुसँधान का साधन पूर्ण करके, शून्य चक्र में पहुंचकर निर्विकल्प सहजावस्था द्वारा हमने परब्रह्म को प्राप्त किया है और प्राप्त करते ही वह अपना निजस्वरूप होकर भासने लगा है ।
(क्रमशः)

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