卐 सत्यराम सा 卐
तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ ।
जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥
दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ ।
तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
जैसे बूंद सागर में खो जाए,ऐसे ही मनुष्य स्वयं को डुबो दे-
अस्तित्व के सौंदर्य में, अस्तित्व की गरिमा में,
अस्तित्व के इस विराट नृत्य में,
इस महोत्सव में, जरा भी दूर-दूर नहीँ ।
ऐसे मगन हो जाए, ऐसे लीन हो जाए
जैसे स्वयं है ही नहीँ ।
ध्यान का अर्थ है : मैँ हूं और कुछ भी नहीँ ।
भक्ति का अर्थ है : तू है, मै बिलकुल नहीँ ।
ये विपरीत प्रतीत होने वाले दो मार्ग एक ही जगह ले आते हैँ।
क्योँकि
जब तू नहीँ है, तो मैँ बच नहीँ सकता। बिना तू के मैँ कैसे बचेगा ?
तू ही तो मैँ की परिभाषा बनता है, तू ही से तो मैँ की सीमा बनती है ।
इसी तरह जब मैँ ही नहीँ हूं, तू ही है - तो तू भी ज्यादा देर नहीँ बचेगा ।
मैँ ही न रहा तो कौन तू !
मैँ न रहे तो तू मिट जाता है; तू न रहे तो मैँ मिट जाता है ।
ये दोनों साथ-2 जीते और साथ-2 मरते हैँ ।
एक को मिटाया तो दूसरा अपने आप मिट जाता है ।
जब न मैँ बचा,
न तू बचा,
वहीँ घटना घट जाती है ।
कोई अज्ञात हृदय-वीणा को छेड़ देता है ।
कोई अदृश्य रुप अपूर्व सौंदर्य दे जाएगा ।
गीत-संगीत रोम-2 में भर जाएगा ।
जब हो जाए ऐसा, तभी ।
तभी आरती सजती है ।
अभी तो मनुष्य आरती क्या सजाएगा, स्वयं को धोखा देता है, औरोँ को धोखा देता है ।
आरती थोथी है अभी ।

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