🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश**
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{सांगोपांग भक्तियोग का वर्णन कर अब योग की चर्चा प्रारम्भ करते हैं । ग्रन्थ-कर्ता ने इस प्रकरण में योग के चार विभाग इस तरह किये हैं - हठयोग, राजयोग, लक्ष्ययोग और अष्टांगयोग । इनमें पहले हठयोग को कहते हैं । पिछले ‘ज्ञानसमुद्र’ ग्रन्थ में ‘हठयोगप्रदीपिका’ और गोरखपद्धति’ के अनुसार विस्तार से हठयोग का वर्णन हो चुका है, यहाँ केवल उसका दिग्दर्शन मात्र है । या जो वहाँ बातें छूट गयी हैं(जैसे योग के लिये उचित स्थान, कर्तव्याकर्तव्य तथा पथ्यापथ्य) उनका विशेष वर्णन है ।}
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*= हठयोग निरुक्ति =*
*= चौपई =*
*अबहि कहूँ हठयोग सुनाई ।*
*आदिनाथ के बन्दौं पाई ।*
*रवि शशि दोऊ एक मिलावै ।*
*याही तें हठयोग कहावै ॥१॥*
हे शिष्य ! अब मैं तुम्हें हठयोग का भलीभाँति व्याख्यान कर सुनाता हूँ । परन्तु उससे पूर्व सब योगविद्याओं के आचार्यों के आदिगुरु भगवान् शिव तथा प्रथम आचार्य परमसिद्ध महात्मा आदिनाथ के चरणकमलों की वन्दना करना अपना कर्तव्य समझाता हूं ।
इसके बाद सर्वप्रथम ‘हठयोग’ शब्द का अर्थ तुम्हें बतला दूँ - योगी द्वारा शरीर में सूर्यनाड़ी(इड़ा) तथा चन्द्रनाड़ी(पिंगला) को सुषुम्णा के साथ मिला देना ही हठयोग है । (इन दोनों नाड़ियों के मिलाने की विधि पीछे ज्ञानसमुद्र में प्राणायाम विधि में विस्तार से बता चुके हैं ।) ॥१॥
(क्रमशः)

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