गुरुवार, 1 सितंबर 2016

= परिचय का अंग =(३७/९)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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नैनहुं बिन सूझे नहीं, भूला कतहूं जाइ ।
दादू धन पावे नहीं, आया मूल गंवाइ ॥३७॥
विवेक - नेत्रों के बिना अनात्म - सँसार मिथ्या नहीं भासता । इसलिए इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो, परमात्मा को भूलकर विषय - प्राप्ति हित अनर्थ करने में प्रवृत्त होता है । अत: राम रूप विशेष धन को न पाकर उलटा अपना मनुष्य शरीर रूप मूलधन भी खोकर शूकर-कूकरादि योनियों में आकर जहां तहां भटकता है ।
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परिचय लै लक्षण सहज
जहां आत्म तहं राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अन्तरगति ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥३८॥
आन्तर आत्मा में वृत्ति लगाने से सहज ही साक्षात्कार के लक्षण प्रकट हो जाते हैं, यह कह रहे हैं - साधक ! तुम अपने अन्त:करण की वृत्ति को आन्तर आत्मा में लगावे रहो, जहां आत्मा है, वहां ही राम है । आत्मा में वृत्ति स्थिर होने पर सेवक को परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हुआ, सूर्य के समान प्रकट रूप से भासने लगता है ।
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परिचय जिज्ञासु उपदेश
पहली लोचन दीजिये, पीछे ब्रह्म दिखाइ ।
दादू सूझे सार सब, सुख में रहे समाइ ॥३९॥ 
३९ - ४० में साक्षात्कार के इच्छुक जिज्ञासुओं को उपदेश कर रहे हैं - हे जिज्ञासु जनो ! प्रथम अपने विवेक - विचार - नेत्रों को ब्रह्म की ओर लगाओ अर्थात् ब्रह्म विचार करो । पीछे विचार की प्रौढ़ावस्था में तुम्हें ब्रह्म अपने आत्म रूप से ही दिखाई देगा । जब तुम्हें सँपूर्ण विश्व के सार स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार हो जायगा, तब तुम्हारा मन सुख - स्वरूप ब्रह्म में ही निमग्न होकर रहेगा ।
(क्रमशः)

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