गुरुवार, 1 सितंबर 2016

= विन्दु (२)८४ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= विन्दु ८४ =** 

**= राजा का अबोध =** 
उक्त दादूजी के यथार्थ विचार राजा के मन में नहीं ठहर सके, कारण पहले दूषित विचार भरे थे, निकले बिना संतों के यथार्थ वचन प्राणी के हृदय में नहीं ठहरते हैं । राजा के मन को चंचल देखकर दादूजी महाराज ने कहा - "स्वामी कही धीर धर भाई ।" धैर्य धारण करके विचार करो किन्तु राजा धैर्य नहीं रख सका और अपने मन में जो भाव प्रतिपक्षियों ने जमा दिया था, उसका आश्रय लेकर बोला - "जो तुमने कहा है सो ज्ञान नहीं है, चतुराई सीख ली है और जनता को बहकाते फिरते हो ।" स्वामी दादूजी महाराज तो शांति प्रिय संत थे, राजा के उक्त वचन सुनकर अपना कथन समाप्त कर दिया । उसी समय दादूजी के किसी शिष्य ने कहा - 
"प्रथम बुलावे भाव कर, पीछे कियो कुभाव । 
लोगन को बाह्यो बह्यो, तातें भोलो राव ।" 
अर्थात् पहले तो अत्यन्त भाव - प्रेमपूर्वक पत्र लिखकर दादूजी महाराज को बुलवाया और आने के पश्चात् कुभाव का प्रदर्शन किया । इससे ज्ञात होता है कि यह राजा कुजनों के के बहकाने से बहक गया है । इसिलिये बुद्धिमान् न होकर भोला ही है । 

**= राजा को पुनः बहकाना =** 
दादूजी से अपने प्रश्नों उत्तर सुनकर राजा अपने महल में गया । तब राजा को निज गुरु गोकुलिये गुसांई उसे आगे बैठ मिले । महन्त चेतनदेवजी ने राजा का गुरु गोकुलिया गुसांई लिखा है । राजा ने गुरु को प्रणाम किया फिर गुरु ने कहा - राजन् ! मैंने सुना है तुम दादू के गये थे । उसके पास तो तुमको कभी नहीं जाना चाहिये था । वह तो महा पाखंडी और नास्तिक है । ठाकुरजी की निन्दा करता है, माला, तिलक, कंठी आदि कुछ भी नहीं रखता है । वह अब तुम्हारे पास में तो आ ही गया है । अब उसे एक माला तो अवश्य दिला दो और माला नहीं धारण करे तो उसे अवश्य मरवा दो । वह जीवित रहेगा तो सब लोग धर्म छोड़ देंगे । उसका उपदेश ऐसा ही है । मानो वह तो साक्षात् कलियुग ही साधु भेष बनाकर आया है ऐसा ज्ञात होता है । राजा ने अपने गुरु के उक्त वचन सुनकर कहा - मैं कहीं बाहर नहीं गया था । उनको यहां ही बुलवाया था । वे दूसरे स्थान में हैं, माला देने का यत्न करूँगा, न लेने पर जैसी आपकी आज्ञा होगी वैसा ही होगा । राजा पहले तो भ्रम में पड़ ही रहा था, अब गुरु के परामर्श से वह भ्रम और भी अधिक बढ़कर दृढ़ हो गया । 
(क्रमशः)

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