रविवार, 4 सितंबर 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (तृ.उ. १२/३) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश**
*= दोहा =* 
*या हठ योग प्रभाव तेन, प्रगट होइ आनन्द ।* 
*बिचरै तीनहुं लोक में, जब लग सूरय चन्द ॥१२॥*
योगी इस हठयोग की अविरल साधना से एक दिन परम सुख(मोक्ष) की अनुभूति(साक्षात्कार) करने लगता है । और वह तीनों(स्वर्ग, मृत्यु और पाताल) लोक में तब तक निवास कर सकता है, जब तक सूर्य और चन्द्रमा इस ब्रह्माण्ड में है । अर्थात् हठयोगी की बहुत लम्बी आयु हो जाती है । या यों कहिये कि वह मृत्यु पर इतना अधिकार कर लेता है कि वह ‘इच्छा -मृत्यु’ हो जाता है ॥१२॥ 
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*= राज योग-लक्षण = चौपाई =*
*राजयोग का कठिन बिचारा ।*
*सँमुझैं बिना न लागै प्यारा ।* 
*राजयोग सब ऊपर छाजै ।*
*जो साधै जो अधिक बिराजै ॥१३॥* 
शास्त्रकारों ने राजयोग की साधना अत्यन्त कठिन बतलायी है । इसका गुरुमुख से श्रवण-मनन किये बिना, अत्यधिक निदिध्यासन किये बिना किसी साधारण व्यक्ति का इसकी ओर झुकाव नहीं हो पाता । यों, राजयोग अन्य सभी योगप्रणालियों में मूर्धन्य है, श्रेष्ठ है । जो इसकी साधना पूर्ण कर लेता है, वह अन्य योगियों से उच्च स्थिति प्राप्त कर लेता है ॥१३॥
(क्रमशः)

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