#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= विन्दु ८४ =**
**= मतवाला हाथी छोड़ना =**
उक्त पद सुनकर तथा विशेष रूप से यह सुनकर कि - हम तो उस एक विश्व के राजा निरंजन राम की ही आज्ञा मानते हैं, राजा ने अपना अपमान समझा और उससे उसमें दुर्बुद्धि उत्पन्न हो गई । उसने दादूजी को मारने का विचार कर लिया । फिर अति शीघ्र ही अपने गुरु तथा मंत्रियों से परामर्श किया, दादू को अति शीघ्र मार दिया जाय और उस कलंक से भी हम बच जायें ऐसा उपाय खोजो । तब उन सबने कहा - आप का हाथी मतवाला हो ही रहा है उसको दादू पर छोड़ दो वह मार देगा और आप कलंक से बच जायेंगे, सबको कह दिया जायगा, मतवाले हाथी के सामने आ जाने से उसने मार दिया । फिर मतवाला हाथी द्वार पर छोड़कर दादूजी को कहला दिया कि - अब आप लोग अपने आसन पर जहां ठहरे हुये हो वहां ही चले जाओ । तब दादूजी उस स्थान से उठ कर अपने शिष्यों के साथ चल पड़े । आगे गरीबदासजी ने मार्ग में मतवाले हाथी को दादूजी के सामने आते देखा, तब दादूजी का हाथ पकड़कर गरीबदास बोले - स्वामिन् ! इन राजा आदि का विचार ठीक ज्ञात नहीं होता है । इस मार्ग में मुझे षड्यंत्र ज्ञात होता है । अतः हमको इस मार्ग से न चलकर किसी अन्य मार्ग से ही आसन पर चलना चाहिये । तब दादूजी ने कहा - इनके भावके अनुसार ही इनको फल मिलेगा, हमारी रक्षा तो समर्थ परमेश्वर करेंगे ही ।
इतने में ही हाथी समीप आ गया । उसे रोकने के लिये रज्जब आगे बढ़ने लगे । रज्जब बाल - ब्रह्मचारी और आजानु - बाहु थे । अतः निर्भयता के साथ आगे बढ़ने लगे तब दादूजी ने रज्जब को रोकते हुये कहा - रुक जाओ किसे रोकने जाते हो । हमारा रक्षक परमेश्वर उसमें भी विराजमान है । दूसरे अद्वैत विचार से वह स्वयं अपना ही आत्मा है । अतः अद्वैत निष्ठा में स्थित हो जाओ । गुरुदेव के वचन सुनकर रज्जब आगे बढ़ने से रुक गये नहीं बढ़े । उस समय गरीबदासजी ने शौर्य दिखाया था अर्थात् वे भी रज्जब के साथ हाथी को रोकने के लिए आगे बढ़ने लगे थे किंतु दादूजी का वचन सुनते ही रज्जब ने गरीबदासजी का हाथ पकड़कर उनको भी रोक लिया ।
(क्रमशः)

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