गुरुवार, 1 सितंबर 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (तृ.उ. ४/६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश**
*= साधना में त्याज्य कर्म =* 
*श्रम न करै बकवाद न माँड़ै ।* 
*होइ असंग चेष्टा छाँड़ै ।* 
*अति उछाह मन मांहैं करई ।* 
*निश्चय राखि धीर्य पुनि धरई ॥४॥* 
(अब साधना करते समय योगी के लिये न करने योग्य कार्यौं का वर्णन सुनो -) योगी को कठोर श्रम नहीं करना चाहिये, अन्यथा प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा स्थापित श्र्वास-विधि में अन्तराय आयगा । व्यर्थ अधिक बोलना भी योगी के लिये त्याज्य है । नास्तिक, आलसी, समाजविरोधी लोगों के साथ बैठ-ऊठ नहीं करना चाहिये । निःसंग शरीर से व्यर्थ चेष्टाएँ(आँखे मटकाना, अंगुली चटकाना, जम्हाई लेना, शरीर तोड़ना आदि) न करे । योग के प्रति, उसकी क्रियाओं के अभ्यास के प्रति अत्युत्साहसम्पन्न बना रहे । योग की सफलता के प्रति दृढ़ निश्चय रखे । और उसमें आयी प्रारम्भिक असफलताओं के प्रति धैर्य रखे, घबराये नहीं ॥४॥ 
*हठ करि आसन साधै भाई ।* 
*हठ करि निद्रा तजतौ जाई ।* 
*हठ ही करि आहार घटावै ।* 
*खाटौ खारौ कछू न पावै ॥५॥* 
शरीर की निरन्तर ऋजु(सरल) रखने के लिये(पहले ज्ञानसमुद्र में बताये) सिद्धासन, पद्मासन आदि का अधिक से अधिक देर तक आग्रहपूर्वक अभ्यास करना चाहिये । उसी तरह आग्रहपूर्वक अधिक से अधिक जागने का(निद्रा छोड़ने का) अभ्यास करना चाहिये । इसी तरह दैनिक भोजन की मात्रा भी धीरे-धीरे आग्रहपूर्वक कम करटे जाना चाहिये । और ध्यान रखे कि खट्टे या नमकीन रस वाले भोजन की मात्रा बिलकुल न रहे ॥५॥ 
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*हठ करि तीक्षण कटुक सु त्यागै ।* 
*सरसों तिल मद मांस न मांगै ।* 
*हरित शाक कबहू नहिं खाई ।* 
*हिंगु ल्हसनु सब देइ बहाई ॥६॥* 
इसी तरह भोजन में तीखे(सिरका, अचार आदि) या कटु पदार्थों का प्रयोग यत्किञ्चित भी न हो । सरसों के तैल से बनी चीजें न खावे, मद्य-मांस आदि तमाम वस्तुओं का भोजन के रूप में कभी उपयोग न करे । इसी तरह हरे शाक(पत्ते) का उपयोग न करे ! हींग, लहसुन, प्याज आदि तामस पदार्थों(जो आलस्य फैलाने वाले हैं, और आलस्य योगी का प्रधान बैरी है) का स्पर्श भी न करे ॥६॥
(क्रमशः)

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