गुरुवार, 1 सितंबर 2016

=१६६=


卐 सत्यराम सा 卐 
कोटि वर्ष क्या जीवना, अमर भये क्या होइ ।
प्रेम भक्ति रस राम बिन, का दादू जीवन सोइ ॥ 
कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि ।
पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥ 
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साभार ~ Vijay Divya Jyoti
प्रेम :: मील का पत्थर 

एक यूनानी कथा ये बताती है की मिदास नाम का एक व्यक्ति था जिसने अपनी पूजा प्रार्थना से किसी देवता को प्रसन्न कर लिया था। देवता ने प्रसन्न होकर कहा मांग ले क्या चाहिए? मिदास ने कहा कि बस इतना कर दीजिये कि जिस चीज़ को भी मैं छूँ लूँ वो सोने की हो जाए। बस फिर क्या था? उत्पात शुरू हो गया उसकी जिंदगी में। पत्नी को छुआ तो वो सोने की हो गयी। बच्चे घर छोड़ कर भाग गए। घर के नौकर दूर से ही डर कर भागने लगे। भोजन को छुआ तो सोना हो गया। वो पानी पिये तो सोना बन जाए। सोचें क्या हुआ होगा मिदास की ज़िंदगी में? भूखा प्यासा रहने लगा क्योंकि खाना खा नहीं सकता था और पानी पी नहीं सकता था। पत्नी प्राणहीन हो गयी, बच्चे छोड़ कर चले गए। सब दुश्मन ही हो गए एक प्रकार से। और अंत में उसने आत्महत्या कर ली क्योंकि और कुछ करने को बचा ही नहीं। सोने को ना खा सकता था और ना ही पी सकता था। 
हममें से अधिकतर की जीवन की कहानी मिदास की ही कहानी है। हम सब भी अपनी ज़िंदगी में इच्छापूर्ति का सोना एकट्ठा करने में लगे रहते हैं। मिदास ने तो केवल एक ही देवता को प्रसन्न किया था लेकिन हम तो ना जाने कितने देवी देवताओं और भगवानों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं मगर किसलिए? इतना ही नहीं हमने तो अपनी वासनाओं के अनुरूप उनके पोर्टफोलियो भी बाँट रखे हैं। मगर क्या वास्तव में हम जानते हैं कि हम क्या चाहते हैं या हमें क्या चाहिए? हमारे अज्ञान से निकली हर चाह या वासना पूर्ति के लिए की गयी हमारी हर मांग मिदास की ही माँग है। मिदास की पत्नी तो फिर भी सोने की हो गयी थी लेकिन अपनी वासनाओं की पूर्ति की व्यर्थ भागदौड़ में हम जीवन के इतने अनमोल पल गंवा देते हैं कि हमारे पास पत्नी को दो क्षण देखने तक का वक़्त नहीं होता। दौड़ जारी रहती है, बच्चे कब बड़े हो गए और कब अपने खुद के आशियाने में चले गए, पता ही नहीं चलता, उनके हिस्से के प्रेम के बदले भी हम सोने की ईंटें बनाकर सौदे करते हैं। धन, पद, प्रतिष्ठा रूपी सोने की ईंटें इकट्ठा करने की होड़ में माँ बाप को शायद ही हम कभी एक क्षण प्रेम से निहार पाते हों और डूबते हों उन क्षणों में जब माँ लोरी सुनाया करती थी और वो लोरी जो किसी प्रार्थना से कम नहीं थी। कैसा अद्भुत प्रेम है जब पिता हमारी खुशी के लिए घोडा बनकर अपनी पीठ पर घुमाते थे, और भी बहुत कुछ। हम हर पल यहीं सोचते हैं कि ये समय तो है धन पद और प्रतिष्ठा बटोरने का और माँ बाप, पत्नी बच्चे कहीं भागे थोड़े ही जा रहे हैं और फिर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हम कर ही रहे हैं, ये सोचकर हम अपनी सोना बनाने की दौड़ जारी रखते हैं और इन सबके प्रेम से वंचित हो जाते हैं क्योंकि वासना और प्रेम कभी साथ रह ही नहीं सकते। 
मगर याद रहे इस दौड़ में थोड़ा सोना तो इकट्ठा हो जाता है लेकिन इस धन, पद और प्रतिष्ठा आदि वासनाओं के सोने के चक्कर में अपने जीवन के कई हीरे-जवाहरात और उनकी प्रेमरूपी चमक के आनंद से वंचित रह जाते हैं। जब अंतिम पड़ाव की तरफ आदमी बढ़ता है तो फिर दिखने लग जाता है कि सोने की मूर्तियाँ तो बहुत हैं मगर प्राणहीन जिनसे ना तो वो प्रेम पा सकता है और ना ही प्रेम कर सकता है। मिदास की तरह सोने की मूर्तियों के चक्कर में ज़िंदा जीवित मूर्तियाँ जो ईश्वर ने आपको अमानत के रूप में दी थी, वो आपकी ज़िंदगी से विदा हो जाती हैं भले ही वो एक ही छत के नीचे मौजूद हों। 
प्रेम विराट ऊर्जा का रूप है और हमने इस ऊर्जा को जीवनभर लगाया सोना बनाने में तो फिर चेतन से प्रेम कैसे हो? इसलिए जीवन में पुरुषार्थ होना चाहिए जरूरतों को ध्यान में रखकर, वासनाओं की अंधी दौड़ आत्मघात के समान है। अपने जीवन में वक़्त निकालिए अपने लिए, अपने बच्चों के लिए अपने माँ बाप के लिए, अपने इष्ट मित्रों के लिए और इन सबसे प्रेम के लिए वरना बहुत देर हो चुकी होगी जब आपको ये दिखेगा कि ये सब आपके पास होते हुए भी कितने दूर हो चुके आपसे या फिर और भी बुरा वक़्त वो होगा जब आप सोचें कि काश मेरी पत्नी या मेरा बच्चा या कोई अपना आज मौजूद होता तो आज मैं उसे खूब प्रेम करता। आज वो हैं उनसे प्रेम करिए क्योंकि प्रेम वो life-force energy है जो जीवन के हर खाली कालम को भर देती है। ये दुनिया चाहे कितनी बड़ी हो, चाहे अरबों लोग इस धरती पर रहते हों लेकिन याद रखिए आप की दुनिया उतनी ही होती है जहां तक आपके प्रेम का विस्तार है, उससे एक इंच भी ज्यादा नहीं। अपनी छोटी सी दुनिया को प्रेम से भर दीजिये। अगर किसी बात पर पिता को गले लगाने को दिल चाहे तो ना ही झिझकना और ना ही देर करना उनको गले लगाके प्रेम का इजहार करने में क्योंकि हमेशा ना तो आप रहेंगे और ना ही वो। अपने बच्चे को प्रेम करिए, अपने मित्रों से प्रेम करिए क्योंकि जब कभी भी आपकी यात्रा पूरी होगी तो आपको एक आत्मसंतोष की अनुभूति रहेगी कि जिस दुनिया में आप रहे, उसे आपने अपने प्रेम के रंग से सींचा, प्रेम का रंग आपने भरा क्योंकि प्रेम ही जीवन के सफर में मील का पत्थर है, मंज़िल का संकेतक है। 


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