शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

= परिचय का अंग =(४०/२)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
**= परिचय का अँग ४ =**
.
आंधी के आनँद हुआ, नैनहुं सूझन लाग ।
दर्शन देखे पीव का, दादू मोटे भाग ॥४०॥
विषयासक्ति रूप मोतिया - बिन्दु आ जाने से अँधी हुई जीवात्मा - युवती के जब सँत और शास्त्र की शिक्षा - औषधि से विवेक, विचार - नेत्र निर्मल हुए तो उससे सँसार मिथ्या और परमात्मा सत्य भासने लगा, तब वह जीवात्मा अपने भाग्य को महान् जानकर निरँतर प्रियतम परमात्मा का दर्शन करने लगी है ।
.
*उभय असमाव*
दादू मिहीं१ महल बारीक है, गांव न ठाँव न नाँव ।
तासौं मन लागा रहे, मैं बलिहारी जाँव ॥४१॥
४१ - ४९ में ब्रह्म की अद्वैतता बता रहे हैं - जिसमें सब सँसार विवर्त्त रूप से निवास करता है, तब ब्रह्म रूप महल अति सूक्ष्म है और व्यापक होने से सब के भीतर१ है । वह बैकुण्ठादि किसी लोक विशेष में नहीं रहता, न उसका शेष - शय्यादि कोई स्थान विशेष है और न उसका कोई नाम है । पुर, स्थान, नाम, ये सब माया से ही होते हैं । शुद्ध ब्रह्म माया रहित अद्वैत है । उसमें उक्त द्वैत प्रपँच नहीं रह सकता । ऐसे शुद्ध ब्रह्म में जिसका मन अद्वैत भाव से लगा रहता है, मैं उस सँत की बलिहारी जाता हूं ।
.
दादू खेल्या चाहे प्रेम रस, आलम अँग लगाइ ।
दूजे को ठाहर नहीं, पुष्प न गँध समाइ ॥४२॥
यदि कोई अपने अन्त:करण इन्द्रियादि अँगों में साँसारिक विषयों की आसक्ति रखकर भगवत् - प्रेम - रस में निमग्न होना रूप खेल खेल ना चाहे, तो वह संभव नहीं । कारण, जिसमें प्रेम रहता है, वह वृत्ति - स्थान अति सूक्ष्म है । जैसे पुष्प में एक साथ दो गँध नहीं रह सकतीं, वैसे ही उसमें एक साथ विषय - राग और प्रभु - प्रेम दोनों नहीं रह सकते । वृत्ति ब्रह्माकार होने पर ब्रह्म में पुष्प - गँध जितना भी द्वैत नहीं रहता ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें