सोमवार, 5 सितंबर 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (तृ.उ. १४/५) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश**
*राजयोग कीना शिव राई ।*
*गौरा संग अनंग न जाई ।* 
*घृत नहिं ढरै अग्नि के पासा ।*
*राजयोग का बड़ा तमासा ॥१४॥* 
राजयोग की साधना भगवान् शिव ने की है । वे दिन-रात पार्वती जी के साथ रहते हैं, परन्तु क्या मजाल कि उन्हें कभी काम-वासना सताये ! यह क्या है ? यह केवल राजयोग की पूर्ण साधना का ही प्रभाव है । राजयोग की महिमा का कहाँ तक वर्णन करें ! यों समझिये कि राजयोगी जगत् में रहते हुए भी उनके व्यवहारों में लिप्त नहीं होता, जैसे घी अग्नि के पास रहने पर भी द्रवित न हो । यह राजयोग का ही प्रभाव है । अर्थात् काम पर विजय प्राप्त कर लेना राजयोग का पहला लक्षण है ॥१४॥ 
*नाड़ी चक्र भेद जाऊ पावै ।*
*तौ चढि बिंद अपूठौ आवै ।* 
*करना कठिन आहि अति भारी ।*
*बशबर्तिनी होइ जौ नारी ॥१५॥* 
प्राणायाम-विधि द्वारा शरीर की(इड़ा, पिंगला आदि) नाड़ियों पर जो नियन्त्रण कर लेता है, पीछे बताये षट्चक्रों का निरन्तर अभ्यास से भेदन कर लेता है उस योगी का कपाली मुद्रा आदि की साधना से वीर्य लौटकर मस्तिष्क में चढ़ जाता है । यद्यपि यह साधना अत्यन्त कठिन है, साधारण आदमी के वश की बात नहीं, परन्तु यदि उसकी अपनी धर्मपत्नी आज्ञाकारिणी हो, वह उसकी साधना में विघ्न न डाले तो यह साधना उस योगी के लिये बहुत दुर्लभ भी नहीं है । अर्थात् ऊर्ध्वरता ब्रह्मचारी होना राजयोग का दूसरा लक्षण है ॥१५॥ 
(क्रमशः)

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