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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= विन्दु ८४ =**
**= मतवाला हाथी छोड़ना =**
फिर दादूजी महाराज ने अपने शिष्यों को यह पद सुनाया -
"निर्भय नाम निरंजन लीजे,
इन लोगन का भय नहिं कीजे ॥ टेक ॥
सेवक शूर शंक नहिं माने, राणा राव रंक कर जाने ॥ १ ॥
नाम निशंक मगन मतवाला, राम रसायन पिवे पियाला ॥ २ ॥
सहजैं सदा राम रंग राता, पूरण ब्रह्म प्रेम रस माता ॥ ३ ॥
हरि बलवंत सकल शिर गाजे, दादू सेवक कैसे भाजे ॥ ४ ॥
इन राजा आदि सांसारिक लोगों का तथा हाथी का भय कुछ भी न करके निर्भयता पूर्वक निरंजनराम का नाम चिन्तन करो । भक्त वीर किसी का भी भय न मानकर महाराणा और राजा आदि को भी रंक के समान जानकार निर्भयता से नामचिन्तन में निमग्न रहता है । इस प्रकार राम - भक्ति रसायन का प्याला पान करके मतवाला बना रहता है । सदा स्वाभाविक रीति से राम - रंग में अनुरक्त रहता है । जो ऐसे पूर्णब्रह्म के प्रेम रस में मस्त है, वह भक्त किसी से भयभीत होकर भजन से कैसे भागेगा ? कारण - जो सबके शिर पर गर्जना करने वाले अपराबल संपन्न हरि हैं, वे उसके सदा सहायक हैं, तब उसे किसका भय है ।
(क्रमशः)

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