सोमवार, 5 सितंबर 2016

= परिचय का अंग =(४६/८)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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मैं नाहीं तहं मैं गया, आगे एक अलाव१ ।
दादू ऐसी बन्दगी, दूजा नाहीं आव ॥४६॥
जहां अनात्म देहादिक अहँकार रूप "मैं" नहीं रहता, उस अवस्था को जब मैं आत्म रूप से प्राप्त हुआ, तब उस आगे की स्थिति में एक मात्र "अहँ - ब्रह्म" यही ध्वनि१ प्रतीत हुई । निर्गुण भक्ति की महिमा ऐसी ही है, उसकी परिपाकावस्था पर अन्त:करण की वृत्ति में अद्वैत ब्रह्म को छोड़ कर द्वैत - भाव आता ही नहीं ।
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दादू आपा जब लगै, तब लग दूजा होइ ।
जब यहु आपा मिट गया, तब दूजा नाहीं कोइ ॥४७॥
जब तक अनित्य देहादिक में आत्म - भ्राँति - रूप अहँकार रहता है, तब तक ही आत्मा और ब्रह्म में द्वैत भासता है । जब उक्त मिथ्या अभिमान ज्ञान द्वारा नष्ट हो जाता है, तब अपने आत्मस्वरूप ब्रह्म को छोड़कर भिन्न कुछ नहीं प्रतीत होता । एक मात्र अद्वैत ब्रह्म ही भासता है ।
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दादू मैं नाहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ ।
मैं तैं पड़दा मिट गया, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥४८॥
जब तक शुद्ध चेतन में अनित्य देहादिक "अहँ, त्वँ" भाव नहीं आता है, तब तक उसकी अद्वैत ब्रह्मरूप से ही प्रतीति होती है । अनित्य देहादिक में "अहँ, त्वँ" भाव आते ही आत्मा और ब्रह्म में द्वैत भाव भासने लगता है । फिर ज्ञान द्वारा "अहँ, त्वँ" भाव रूप अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब जैसा पूर्व में अद्वैत रूप था वैसा ही अद्वैत रूप भासने लगता है । अत: द्वैत रूप विकार मध्य में भ्रम से ही भासता है, आदि व अन्त में परमार्थ रूप अद्वैत ही सिद्ध होता है ।
(क्रमशः)

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