शनिवार, 3 सितंबर 2016

=१७०=

卐 सत्यराम सा 卐 
खरी कसौटी पीव की, कोई बिरला पहुँचनहार ।
जे पहुँचे ते ऊबरे, ताइ किये तत सार ॥ 
दुर्बल देही निर्मल वाणी, दादू पंथी ऐसा जाणी ।
काहू जीव विरोधे नांही, परमेश्वर देखे सब माँही ॥ 
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साभार ~ Rp Tripathi
** सांसारिक रिश्तों :: और :: ईख में एक-रूपता **
सांसारिक रिश्तों और ईख में काफ़ी एक रूपता है मित्रों !! 
जिस तरह प्रत्येक ईख हमेशा ; रस-युक्त और रस-रिक्त जिसे गाँठ कहते हैं ; दो भागों से मिलकर बनता है ; उसी तरह प्रत्येक सांसारिक रिश्ता भी हमेशा ; माधुर्यता और मन-मुटाव रूपी गाँठ के ; दो भागों से मिलकर बनता है !!
और जिस तरह एक समझदार किसान ; 
ईख के रस-युक्त भागों की मदद से ; स्वादिष्ट व्यंजन बना लेता है ; तथा गाँठ को ज़मीन में दबा कर ; उससे पुनः ईख पा लेता है ; ...... 
उसी तरह एक समझदार व्यक्ति ; माधुर्यता की मदद से जीवन हर्षोल्लास-मय बना लेता है ; तथा मनमुटाव को अपने अंतर्मन में दबा कर ; परिवार में नए-नए रिश्तों से जुड़ता जाता है !!
परंतु जो मूर्ख किसान ; 
गाँठ को ज़मीन के अंदर नहीं दबाता ; वह अन्य ईख की फ़सल से वंचित हो जाता है !!
इसी प्रकार जो मूर्ख व्यक्ति ; 
मनमुटाव को अपने अंतर्मन में नहीं ढकता !! अर्थात उन्हें अपनी ज़ुबान पर ले आता है ; वह अभागा भी जीवन में रिश्तों की फ़सल ; अर्थात पारिवारिक सुख से वंचित रह ; एकांकी-जीवन जी ; इस संसार से विदा हो जाता है !!
अतः मित्रों ; 
इस उपरोक्त तथ्य से रिश्तों की वास्तविकता समझ ; क्यों ना हम सब ; सम्पूर्ण संसार को अपना कुटूम्ब बनाने की दिशा में प्रयास करें !!
उपरोक्त से सहमत हैं ना सम्मानित मित्रों ?
******** ॐ कृष्णम वन्दे जगत गुरुम *******

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