॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= परिचय का अँग ४ =**
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नाहीं ह्वै कर नाम ले, कुछ न कहाई रे ।
साहिबजी की सेज पर, दादू जाई रे ॥४३॥
देहादिक अध्यास रूप अहँकार और साँसारिक वासनादि से अन्त:करण को रहित करके भगवान् का नाम स्मरण करो किन्तु अपने को भक्त, सँत, योगी आदि कहलाने का यत्न मत करो । उक्त द्वैत प्रपँच से जो मुक्त होता है, वही ब्रह्म की अद्वैत - शय्या पर जाता है । परब्रह्म अद्वैत है, उसे उससे भिन्न रह कर नहीं प्राप्त कर सकते ।
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जहां राम तहं मैं नहीं, मैं तहं नाहीं राम ।
दादू महल बारीक है, द्वै को नाहीं ठाम ॥४४॥
जिस अद्वैतावस्था में राम का साक्षात्कार होता है, वहां "मैं ज्ञानी हूं, मैं गुणी हूं" इत्यादिक अहँकार रूप "मैं" नहीं होता और जहां तक उक्त "मैं" होता है, वहां तक राम का साक्षात्कार नहीं होता । जिसमें सँसार विवर्त्त रूप से बसता है, वह अधिष्ठान चेतन रूप महल अति सूक्ष्म है । उसमें द्वैत - भाव को स्थान नहीं मिलता ।
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मैं नाहीं तहं मैं गया, एकै दूसर नांहिं ।
नाहीं को ठाहर घणी, दादू निज घर मांहिं ॥४५॥
जिस ब्रह्म में अनात्म अहँता ममता नहीं है, उसको मैं प्राप्त हुआ हूं । उसे प्राप्त होते ही आत्मा उसमें अद्वैत रूप से होकर रहता है, द्वैत रूप से नहीं । अपने स्वस्वरूप ब्रह्म - घर में अनात्म अहँकार शून्य आत्मस्थिति को प्राप्त हुये ज्ञानी - सँत के लिए ब्रह्मानन्द रूप स्थान बहुत है, अज्ञानी के लिए किंचित् भी नहीं है ।
(क्रमशः)

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