शनिवार, 3 सितंबर 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (तृ.उ. ९/११) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका (ग्रंथ२)*
**अथ हठयोग नामक - तृतीय उपदेश**
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*= योग के षट्कर्म =*
*षट कर्मिनि करि देह प्रछाले ।*
*नाड़ी शुद्ध होंहि मल टालै ।*
*बिधि करि करैं क्रिया हैं जेती ।*
*धौती बस्ती अरु पुनि नेति ॥९॥* 
साधक को(आगे बतायी जा रही) योग की छह क्रियाओं द्वारा शरीर का शोधन करना चाहिये । इससे श्वासवाहिनी नलिकाएँ स्वच्छ हो जाती हैं, उनका मैल(श्लेष्मादिविकार) निकल जाता है । साधक को गुरु के उपदेशानुसार यथाविधि धौति, वस्ति और नेति क्रियाएँ करनी चाहिये ॥९॥ 
योग के षटकर्म -
“धौतिर्वसितस्तथा नेतिः नौलिका त्राटकस्तथा । 
कपालभातिश्चैतानि षट् कर्माणि समाचरेतु” ॥ 
अर्थात् १.नेति, २.धौति, ३.नौली, ४.त्राटक, ५.कपालभाति, ६.बस्ति ।
*त्राटक निरखै नौली फेरै ।*
*कपाल भाथी नीकै हेरै ।*
*ये षट कर्म सिद्धि के दाता ।*
*इन तैं सूक्षम होइ सु गाता ॥१०॥* 
त्राटक मुद्राद्वारा भ्रूमध्य में ध्यान लगाने का अभ्यास करे तथ नौली और कपालभाति क्रिया यथाविधि करनी चाहिये । ये छहों क्रियाएँ साधक को योगसिद्धि की ओर ले जाने वाली हैं, और इनसे साधक का शरीर भी धीरे-धीरे हल्का(लघुतासम्पन्न) होता जाता है ॥१०॥
*आउं पित्त कफ रहै न कोई ।*
*नख सिख लौं वपु होई ।* 
*सदाभ्यास तें होइ सु छंदा ।*
*दिन दिन प्रकटै अति आनंदा ॥११॥*
इन छहों क्रियाओं की यथाविधि यथासमय साधना से शरीर में आम(अपक्व) पित्त, या कफ नहीं रह जाता, शरीर नख से शिखा तक(पैर से सिर तक) निर्मल(निर्दोष = निर्विकार) हो जाता है । इन क्रियाओं के भली-भाँति अभ्यास से योगी का शरीर स्वछन्द(स्वाधीन) हो जाता है, जब चाहे तब कोई रोग-दोष इसमें प्रकट नहीं हो सकते । और दिन प्रतिदिन साधक सुखपूर्वक योगाभ्यास में अधिक प्रवृत्त होने में आनन्द मानता है ॥११॥
(क्रमशः)

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