शनिवार, 3 सितंबर 2016

= विन्दु (२)८४ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= विन्दु ८४ =**

उक्त वचन कहकर, मैं विश्व के राजा की ही आज्ञा मानता हूँ दादूजी ने यह पद बोला - कहा भी है - 
"कहा भरूंठे राव ने, दादू चल मम गाँव । 
ताको या पद से कहा, नृपति सुनायों नाँव ॥

"एसो राजा सेऊं ताहि, और अनेक सब लागे जाहिं ॥ टेक ॥ 
तीन लोक ग्रह धरे रचाइ, चन्द सूर दोउ दीपक लाइ । 
पवन बुहारे गृह आँगणा, छपन कोटि जल जाके घराँ ॥ १ ॥ 
राते सेवा शंकर देव, ब्रह्म कुलाल न जाने भेव । 
कीरति करणा चारों वेद, नेति नेति न विजाणैं भेद ॥ २ ॥ 
सकल देवपति सेवा करैं, मुनि अनेक एक चित धरैं । 
चित्र विचित्र लिखें दरबार, धर्मराय ठाढ़े गुणसार ॥ ३ ॥ 
रिधि सिधि दासी आगे रहैं. चार पदारथ जी जी कहैं ।
सकल सिद्ध रहें ल्यौ लाइ, सब परि पूरण ऐसा राइ ॥ ४ ॥ 
खलक खजीना भरे भंडार, ता घर बरतैं सब संसार । 
पूरि दीवान सहक सब दे, सदा निरंजन ऐसो है ॥ ५ ॥
नारद गावें गुण गोविंद, करे सारदा सबही छंद । 
नटवर नाचे कला अनेक, आपन देखे चरित आलेख ॥ ६ ॥ 
सकल साधु बाजैं निशान, जै जै कार न मेटैं आन । 
मालिनी पुहुप अठारह भार, आपणदाता सिरजनहार ॥ ७ ॥ 
ऐसो राजा सोई आहि, चौदह भुवन में रह्यो समाइ । 
दादू ताकी सेवा करे, जिन यहु रचले अधर धरे ॥ ८ ॥ 
समर्थ प्रभु को सामर्थ्य रूप लीला दिखा रहे हैं - मैं ऐसे राजा की समीपता सेवन करता हूँ और सदा आज्ञा मानता हूं, जिसकी सेवा में अन्य अनेक राजा लगे हैं । जिसने त्रिलोक रचे हैं और ग्रहों को रचकर यथा - स्थान रक्खे हैं । सूर्य, चन्द्र दो दीपक लगाये हैं । जिनके घर वायु गृहांगण को साफ करते हैं । छप्पन कोटि जलद जल भरते हैं । शंकरादिक सेवा में अनुरक्त हैं । ब्रह्मा कुलाल के समान शरीरों की रचना रूप सेवा में संलग्न हैं किन्तु प्रभु के स्वरूप रहस्य को पूर्ण रूप से नहीं जानते हैं । ऋग्, यजु, साम और अथर्व चारों वेद यश - गान करते हैं किंतु उनके स्वरूप रहस्य को विशेष रूप से न जानकर "यह नहीं यह नहीं" कहकर मौन हो जाते हैं । 
सब देवताओं के स्वामी इन्द्र भी उनकी सेवा करते हैं । अनक मुनि उन अद्वैत प्रभु में ही चित्त को लगाये रखते हैं । जिनके दरबार में चित्रगुप्त प्राणियों के पाप - पुण्य का हिसाब विचित्र ढंग से लिखते रहते हैं । श्रेष्ठ गुण वाले धर्मराज खड़े रहते हैं । ऋद्धि सिद्धियां दासी के समान आगे खड़ी रहती हैं । अर्थ, धर्म, काम, और मोक्ष चारों पदार्थ भी जी भगवन् ! जी भगवन् ! करते रहते हैं । संपूर्ण सिद्ध अपनी - अपनी वृत्ति उनके स्वरूप में लगाकर रहते हैं, वे ऐसे राजा हैं, जो सभी कलाओं में परिपूर्ण हैं । संसार के लिये उनने धन के कोष और वस्तुओं के भंडार भर रक्खे हैं । सब संसार उन्हीं से लेकर सब वस्तुयें बरतता है । 
वे महान् प्रभु अनायास ही भक्तों की कमी पूर्ण कर देते हैं । वे ऐसा कार्य करने पर भी सदा निरंजन ही बने रहते हैं, मायारूप अंजन उनके नहीं लगता है । नारद उन गोविन्द के गुण - गान करते रहते हैं । सब प्रकार के छंदों से सरस्वती उनकी स्तुति करती है । वे नटवर अनेक कलाओं द्वारा नृत्य करते हैं । वे अलेख प्रभु अपने चरित्र को आप ही देखते हैं । संपूर्ण संत ही उनके नगाड़े हैं । उन प्रभु की महिमारूप ध्वनि उनसे निकलना ही उनका बजना है वा सभी संतों के उनकी महिमारूप नगाड़े बजते रहते हैं । जय जय आकार वाली ध्वनि होती ही रहती है । संत उनकी मर्यादा नहीं मेटते । अठारह भार वनस्पति उनके पुष्प पहुंचाने वाली मालिनि है । सृष्टिकर्ता प्रभु आपही सबको कर्मानुसार देते रहते हैं । चौदह भुवनों में समाये हुये हैं । ऐसे जो राजा हैं, वे ही हमारे उपास्य हैं । जिनने यह संसार रचकर अधर धर रक्खा है, हम उन्हीं प्रभु की सेवा - भक्ति करते हैं । उन्हीं की आज्ञा मानते हैं । 
(क्रमशः)

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