सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/३४-६)


卐 सत्यराम सा 卐 
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =** 
आज्ञा माँहीं बाहर भीतर, आज्ञा रहे समाइ । 
आज्ञा माँहीं तन मन राखे, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥३४॥ 
भक्त शरीर से होने वाले कार्य भगवदाज्ञानुसार ही करता है । शरीर के भीतर मन से सँकल्प - विकल्प, चित्त से चिन्तन, बुद्धि से विचार आदि सभी भगवदाज्ञानुसार ही करता है । इस प्रकार अपने तन मन को भगवदाज्ञा में रखकर निष्काम पतिव्रत से युक्त भक्त भगवदाज्ञा में समाया हुआ रहता है तथा वृत्ति भगवत् स्वरूप में ही लगाकर रहता है ।
पतिव्रता गृह आपने, करे खसम की सेव । 
ज्यों राखे त्यों ही रहे, आज्ञाकारी टेव ॥३५॥ 
जैसे पतिव्रता अपने घर में रहकर सदा स्वामी की सेवा करती है, वैसे ही निष्काम साधक भगवान् से पतिव्रत रखकर अपने अधिकारानुसार सेवा करता रहता है । उसे भगवान् जैसे रखता है, वैसे ही रहता है । उसका तो आज्ञा पालन करने का स्वभाव ही बन जाता है । 
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**सुन्दरी विलाप** 
दादू नीच ऊँच कुल सुन्दरी, सेवा सारी होइ । 
सोइ सुहागिनि कीजिये, रूप न पीजे धोइ ॥३६॥ 
३६ - ३७ में निष्काम पतिव्रत युक्त साधक - सुन्दरी का नित्य सुहाग - प्राप्ति हित विलाप दिखा रहे हैं - हे भगवान् ! साधक - सुन्दरी चाहे नीच कुल की हो वो उच्च कुल की, उसकी तो भक्ति पूर्ण - प्रेमयुक्त होनी चाहिए । जिसकी भक्ति निष्काम पतिव्रत - युक्त हो, वही आप की नित्य समीपता रूप सुहाग प्राप्त करने योग्य है, उसे सुहागिनी कीजिये । शेष जैसे प्राकृत - सुन्दरी का रूप धोकर नहीं पान किया जाता, वैसे ही बहिरँग साधन - सौन्दर्य तो प्रदर्शन मात्र ही है, उससे क्या बनता है ? 
(क्रमशः)

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