सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

= विन्दु (२)९३ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
**= विन्दु ९३ =**
.
नारायणा नरेश प्रतिदिन दादूजी के दर्शन, सत्संग के लिये आता था और उस के साथ जो उस के भाई बाहर से दादूजी के दर्शन करने आते थे, वे भी आते थे । त्रिपोलिया निवास के दूसरे दिन राजा दादूजी के दर्शन को आये तब उनके साथ वैरीसाल(दुर्जन साल) गुढ़ा वाले, मनोहरदास मढ़ा वाले, हमीरसिंह धांदोली वाले और बाघसिंह कालक वाले भी साथ थे । ये सब त्रिपोलिया पर दादूजी के दर्शन करके तथा प्रणाम करके दादूजी के सामने बैठ गये फिर अवकाश देखकर दुर्जनसाल ने दादूजी से पूछा – भगवन् ! काल कब आता है ? तब दादूजी महाराज ने यह पद कहा - 
.
**= दुर्जनसाल के प्रश्न का उत्तर =** 
"आदि काल अंतकाल, मध्य काल भाई । 
जन्म काल जरा काल, काल संग सदाई ॥ टेक ॥ 
जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई । 
काल चलत काल फिरत, कबहूं ले जाई ॥ १ ॥ 
आवत काल जात काल, काल कठिन खाई । 
लेत काल देत काल, काल ग्रसे धाई ॥ २ ॥
कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई । 
काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥ ३ ॥ 
काल आगे काल पीछे, काल संग समाई । 
काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥ ४ ॥ 
हे भाई ! आदि की शिशु अवस्था से अन्त की वृद्धावस्था तक तथा मध्य की युवावस्था में भी अपना प्रमाद रूप काल साथ ही रहता है । इस प्रकार जन्म से जरावस्था तक काल सदा संग ही रहता है । जागते, सोते, चलते, फिरते कभी भी झपट्टा मार कर ले जाता है । आते, जाते, लेते, देते यह कठोर काल खा जाता है । कहते, सुनते, संबन्ध करते भी काल दौड़ कर ग्रस लेता है, काल ही काम क्रोधादिरूप से जाल के समान सर्वत्र व्याप्त हो रहा है और आगे, पीछे, संग में रहता है तथा अन्तःकरण में समाया हुआ रहता है । 
अतः काल से बचने के लिये काल रहित राम की शरण ग्रहण करके उसी में अपनी वृत्ति लगाओ । फिर मनोहरदास ने दादूजी से पूछा - भगवन् ! मैं भी प्रभु प्राप्ति के पथ का पथिक हूं किन्तु मुझे उस पथ का यथार्थ ज्ञान नहीं है, सो आप कृपा करके बताइये ! तब प्रभु पथ के परम विशेषज्ञ दादूजी महाराज ने उनको यह पद सुनाया - 
.
**= मनोहरदास के प्रश्न का उत्तर =** 
पंथीड़ा पंथ पिछाणी रे पीवका, गह विरह की बाट ।
जीवित मृतक हो चले, लंघे औघट घाट पंथीड़ा ॥टेक॥ 
सद्गुरु शिर पर राखिये, निर्मल ज्ञान विचार । 
प्रेम भक्ति कर प्रीति से, सन्मुख सिरजनहार, पंथीड़ा ॥ १ ॥ 
पर आतम से आतमा, ज्यों जल जलहि समाइ । 
मन हीं से मन लाइये, लैके मारग जाइ, पंथीड़ा ॥ २ ॥ 
ताला बेली ऊपजे, आतुर पीड़ पुकार । 
सुमरि सनेही आपणा, निशदिन बारंबार पंथीड़ा ॥ ३ ॥ 
देख देख पग राखिये, मारग खांडे धार । 
मनसा वाचा कर्मना, दादू लंघे पार, पंथीड़ा ॥ ४ ॥ 
हे साधक पथिक ! प्रभु को प्राप्त करने का साधन मार्ग संतों द्वारा पहचान और विरह का मार्ग पकड़ के आगे बढ़, जीवितावस्था में ही मृतक के समान निर्द्वन्द्व होकर चल, तब ही काम क्रोधादिक रूप विकट घाटियों को लांघ सकता है । प्रीति पूर्वक प्रेमाभक्ति द्वारा परमात्मा के सन्मुख रह अर्थात् भजन करता रह और सद्गुरु के उपदेश को शिरोधार्य मानकर उनके संशय विपर्यय - मल से रहित ज्ञान का विचार करते हुये जैसे जल में जल मिल जाता है, वैसे ही आत्मा को परमात्मा में लीन कर । यद्यपि यह मार्ग कठिन है, तो भी जब प्रभु प्राप्ति के लिये हृदय में व्याकुलता उत्पन्न हो तब अति शीघ्रता से अपनी व्यथा प्रभु को पुकार पुकार कर सुनाते हुये अपने व्यष्टि मन को समष्टि मन में अर्थात् प्रभु के मन में लय करना चाहिये । इस प्रकार लय - योग के मार्ग द्वारा साधक प्रभु स्वरूप के पास पहुँच जाता है । 
उक्त प्रकार बारंबार रात्रि - दिन में अपने प्रियतम प्रभु का स्मरण कर और विचार नेत्रों द्वारा देख - देखकर इस मार्ग पर पैर रख । उक्त मार्ग खांडे की धार के समान है किन्तु जो साधक मन वचन कर्म से सावधान रहता है, वह इस मार्ग के द्वारा संसार - सिन्धु को तैरते हुये पार जाकर परब्रह्म को प्राप्त होता है । उक्त पद सुनकर के मनोहरदास का हृदय कमल खिल उठा और प्रसन्नता के साथ मनोहरदास ने कहा - गुरुदेव ! आपकी कृपा से मुझे प्रभु - पथ का बोध हो गया है । अब आपके कथनानुसार ही करूंगा । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें