卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =**
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मन अपना लै लीन कर, करणी सब जँजाल ।
दादू सहजैं निर्मलला, आपा मेट संभाल ॥४॥
निष्काम भाव और अनन्यता बिना यज्ञ - दानादि कर्त्तव्य - कर्म - बन्धन रूप हैं । अत: ब्रह्म - चिन्तन में ही वृत्ति लगाकर मन को ब्रह्म में लीन करना चाहिए । जो कर्त्तव्य - कर्म का अभिमान हृदय से हटा कर निष्काम भाव और अनन्यता पूर्वक निरन्तर भगवान् का स्मरण करता है, वह अनायास ही अविद्या मल से रहित होकर ब्रह्म को प्राप्त होता है ।
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दादू सिद्धि हमारे साँइयाँ, करामात करतार ।
ऋद्धि हमारे राम है, आगम अलख अपार ॥५॥
५ में पतिव्रत दिखा रहे हैं - हे साधको ! हमारी सिद्धि (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व, वशित्व) भगवान् ही है । सृष्टिकर्त्ता भगवान् ही हमारा चमत्कार है । हमारा ऐश्वर्य भी राम ही है । भविष्य व शास्त्र भी हमारे मन इन्द्रियों का अविषय अपार भगवान् ही है ।
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गोविन्द गोसांई, तुम्हीं आमचे१ गुरु, तुम्हीं आमचा ज्ञान ।
तुम्हीं आमचे देव, तुम्हीं आमचा ध्यान ॥६॥
६ - १२ में अपने पतिव्रत की निष्ठा विनय रूप से भगवान् को कह रहे हैं - वेद वाणी से प्राप्त होने योग्य, विश्व के स्वामी गोविन्द ! हमारे तो आप१ ही गुरु हैं, आप ही ज्ञान, देव और ध्यान हैं ।
(क्रमशः)

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