शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

= विन्दु (२)९३ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= विन्दु ९३ =**

**= स्वपन में राजा को हरि आज्ञा =** 
स्वप्न में हरि ने कहा - तुम संत प्रवर दादूजी को अपने ग्राम नारायणा में लाकर उनके लिये धाम बनाने का संकल्प करोगे तो कल ही तुम्हारी विजय हो जायगी । जो भी तुम्हारे सामने युद्ध में आयेगा वही मारा जायगा । तब राजा ने स्वप्न में ही हरि की आज्ञा मानली और संकल्प किया कि मेरी विजय होते ही मैं नारायणा जाकर तथा स्वामी दादूजी को नारायणा लाकर उनको जहां इच्छा होगी वहाँ ही धाम बनवा दूंगा । फिर वह जागा तब सब बात स्मरण आ गई । राजा नारायणसिंह ने स्पप्न की बात यथार्थ मानकर युद्ध में प्रवेश किया फिर उसी दिन उनकी विजय हो गई । तब उनने स्वप्न के वचनों को सर्वथा सही पाया इससे उनकी दादूजी महाराज को नारायणा लाने की तीव्र इच्छा हो गई ।
नारायणा नरेश नारायणसिंह, जगमाल के पौत्र और खंगार के पुत्र थे । खंगार के १६ पुत्र थे उनमें बड़े नारायणसिंह थे जिनको नारायणदास भी बोलते थे । स्वप्न में दी गई ईश्वर आज्ञा के कारण नारायणसिंह की दादूजी में बहुत श्रद्धा बढ़ गई थी और राजा को उनके भाई दुर्जनशाल ने भी कहा - दादूजी को नारायणा अवश्य लाना चाहिये । वह दुर्जनशाल की बात भी नारायणसिंह को बहुत प्रिय लगी । फिर नारायणसिंह दक्षिण से नारायणा में आये और दादूजी को बुलवाने के लिये मन्त्री कपूरचन्द, भाई रायमल और अमरा आदि को भेजने लगे तब ब्राह्मणों ने कहा - दादूजी संत तो अच्छे हैं किन्तु उनके लिये यहाँ धाम बनाकर उन्हें यहाँ रखा जायगा तो तुम्हारा राज्य नहीं रहेगा । उनकी ही प्रधानता यहां रहेगी । तब ब्राह्मणों को राजा कहा - मुझे तो परमात्मा की आज्ञा है । हमें तो दादूजी को यहां रखनें में महान् निधि होने का सा सुख मिल रहा है । अतः दादूजी को यहां रखा ही जायगा । जो दादूजी को यहाँ रखने की विपरीत बात कहते हैं, उनको हरि की शपथ है । वे फिर ऐसी बात न कहे और यदि कहेंगे तो उनके लिए अच्छा नहीं रहेगा । फिर विपरीत बोलने वाले मौन हो गये ।
भाई रायमल, अमरा और मन्त्री कपूरचन्द आदि ने बखना जी को भी साथ में ले लिया था । फिर सब दादूजी महाराज को लाने के लिये चले तब ज्ञात हुआ कि इस समय दादूजी महाराज मोरड़ा ग्राम में हैं । तब वे सब मोरड़ा गये । दादूजी महाराज का दर्शन करके अति प्रसन्न हुये । सबने सत्यराम बोलकर दंडवत प्रणाम किया फिर हाथ जोड़कर दादूजी के सामने बैठ गये और अवकाश देखकर कहा - स्वामीजी महाराज ! आपको नारायणा नरेश नारायण सिंह ने सप्रेम प्रणाम कहा है और आपको नारायणा पधारने के लिये अति आग्रह पूर्वक प्रार्थना की है । हम सब आपको नारायणा ले जाने के लिए ही राजा की आज्ञा से आपके चरणों में आये हैं । राजा की तथा हम सबकी यही प्रार्थना है कि आप हम लोगों के साथ अति शीघ्र पधारकर राजा तथा नारायणा की जनता को अपने दर्शन तथा सत्संग से कृतार्थ करने की कृपा करैं । 
(क्रमशः)

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