रविवार, 19 फ़रवरी 2017

= विन्दु (२)९३ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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**= रघुनाथ मन्दिर में आसन =** 
उक्त प्रकार शनैः शनैः समाज के साथ चलते - चलते दादूजी रघुनाथ मंदिर में पहुँच गये । वहां सब प्रकार का प्रबन्ध पहले ही कर दिया गया था । नूतन वस्त्र बिछा दिये गये थे । जल के कोरे कलश भरा दिये गये थे और भी आवश्यक साधन सामग्री सब उपस्थित थी तथा सेवक पास रख दिये गये थे और जो भी आवश्यकता हो उसको उसी समय पूरी कर देने की आज्ञा सेवकों को दे दी थी । 
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**= भोजन प्रसंग =** 
मंदिर में आसन लग जाने पर राजा ने भोजन के लिये पूछा - जैसा भोजन संतों को रुचिकर हो वैसा ही भोजन बना दिया जायगा आप आज्ञा दें । कृपा करके हम लोगों को थोड़ा संकेत अवश्य कर दें । जिससे संतों के प्रतिकूल कुछ न बनाया जाय । तब दादूजी महाराज ने कहा - सभी संत सात्विक भोजन करते हैं । फिर टीलाजी ने कहा - गुरुदेवजी तो चार पैसे भर बाजरे का दलिया पाते हैं और सब संत भिखान्न पाते हैं, सो भी दिन के ११ - १२ बजे एक समय ही पाते हैं । उस समय बस्ती में सब के यहां भोजन बन ही जाता है । तब दो चार संत स्वयं ही जाकर भिक्षान्न ले आते हैं और सबको जिमा देते हैं । आपको संतों के भोजन के लिये कुछ भी प्रबन्ध नहीं करना है । संत आपके यहां से भी भिक्षा ले आया करेंगे । सब संतों का ऐसा ही दृढ़ नियम है । 
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तब राजा ने कहा - संतों का नियम तो मैं भी भंग नहीं करना चाहता, मैं तो संतों की सेवा ही करना चाहता हूँ और वह भी संतों की इच्छानुसार ही करना चाहता हूँ हठपूर्वक नहीं । राजा का उक्त वचन सुनकर टीलाजी ने कहा भक्तों को ऐसा ही करना चाहिये । सेवा के निमित्त भी संतों से हठ करना अच्छा नहीं होता है । उससे संत संकोच में पड़ जाते हैं, उनकी स्वतन्त्रता में बाधा पड़ती है । फिर सत्संग, संकीर्तन होने पर कुछ देर परस्पर विचार गोष्टी चली । 
(क्रमशः)

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