卐 सत्यराम सा 卐
श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥
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साभार ~ Rajnish Gupta
(((((((((( सृष्टि के रचयिता ))))))))))
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जिस समय केवल अन्धकार ही अंधकार था; न सूर्य दिखाई देते थे न चन्द्रमा, अन्य ग्रहों और नक्षत्रों का भी पता नहीं था, न दिन होता था न रात ।अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु की भी सत्ता नहीं थी – उस समय केवल सदा शिव की ही सत्ता विद्धमान थी, जो अनादि और चिन्मय कही जाती थी उन्ही भगवान सदाशिव को वेद पुराण और उपनिषद तथा संत महात्मा ईश्वर तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं |
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एक बार भगवान शिव के मन में सृष्टि रचने की इच्छा हुई । उन्होंने सोचा की मैं एक से अनेक हो जाऊं | यह विचार आते ही सबसे पहले परमेश्वर शिव ने अपनी परा शक्ति अम्बिका को प्रकट किया तथा उनसे कहा सृष्टि के लिए किसी दूसरे पुरुष का सृजन करना चाहिए, जिसके कंधे पर सृष्टि चलन का भार रखकर हम आनंदपूर्ण विचरण कर सकें |
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ऐसा निश्चय करके शक्ति सहित परमेश्वर शिवा ने आपने वाम अण्ड के १० वे भाग पर अमृत मल दिया । वंहा से तत्काल एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ ।
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उसका सौन्दर्य अतुलनीय था । उसमे सत्गुर्ण सम्पन की प्रधानता थी। वह परम शांत और सागर की तरह गंभीर था । उसके चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पध सुशोभित हो रहे थे |
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उस दिव्य पुरुष ने भगवान शिव को प्रणाम करके कहा ‘भगवन मेरा नाम निश्चित कीजिये और काम बताइये ।’ उसकी बात सुनकर भगवान शिव शंकर ने मुस्कुराते हुए कहा ‘वत्स ! व्यापक होने के कारन तुम्हारा नाम विष्णु होगा । सृष्टि का पालन करना तुम्हारा काम होगा । इस समय तुम उत्तम तप करो’|
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भगवान शिव का आदेश प्राप्त कर विष्णु कठोर तपस्या करने लगे । उस तपस्या के श्रम से उनके अंगो से जल धाराएं निकलने लगी, जिससे सूना आकाश भर गया ।
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अंततः उन्होंने ठक्कर उसी जल में शयन किया । जल अर्थात ‘नीर’ में शयन करने के कारण ही श्रीविष्णु का एक नाम ‘नारायण’ हुआ|
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तदन्तर सोये हुए नारायण की नाभि से एक उत्तम कमल प्रकट हुआ । उसी समय भगवान शिव ने आपने दाहिने अण्ड से चतुर्मुखः ब्रम्हा को प्रकट करके उस कमल पर बैठा दिया ।
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महेश्वर की माया से मोहित हो जाने के कारण बहुत दिनों तक ब्रम्हा जी उस कमल की नाल में भ्रमण करते रहे । किन्तु उन्हें अपने उत्तप्तिकर्ता का पता नहीं लगा ।
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आकाशवाणी द्वारा तप का आदेश मिलने पर आपने जन्मदाता के दर्शनार्थ बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की । तत्पश्चात उनके समुख विष्णु प्रकट हुए ।
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श्री परमेश्वर शिव की लीला से उस समय वँहा श्री विष्णु और ब्रम्हा जी के बीच विवाद हो गया । कुछ देर बाद उन दोनों के मध्य एक अग्निस्तम्भ प्रकट हुआ । बहुत प्रयास के बाद भी विष्णु एंव ब्रम्हा जी उस अग्निस्तम्भ के आदि – अंत का पता नहीं लगा सके ।
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अंततः थककर भगवान विष्णु ने प्रार्थना की ‘हे महाप्रभो ! हम आपके स्वरुप को नहीं जानते । आप जो कोई भी हैं, हमें दर्शन दीजिये ।’
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भगवान विष्णु की स्तुति सुनकर महेश्वर सहसा प्रकट हो गए और बोले – सुरश्रेष्ठगण ! मैं तुम दोनों के तप और भक्ति से भलीभांति संतुष्ट हूँ । ब्रम्हा ! तुम मेरी आज्ञा से जगत की सृष्टि करो और वत्स विष्णु ! तुम इस चराचर जगत का पालन करो ।
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तदन्तर भगवान शिव ने अपने हृदयभाग से रूद्र को प्रकट किया और संहार का दायित्व सौंपकर वहीं अंतर्ध्यान हो गये।
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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