🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*(ग्रन्थ ४) सुख समाधि*
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*अंधकार मिट गयौ सहज ही,*
*बाहरि भीतरी भयौ उजास ।*
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवैं सुन्दरदास ॥२१॥*
अब हमारा सभी अद्वैतरूपी अज्ञानान्धकार पूर्णतः विनष्ट हो गया, और सूर्य के प्रकाश से बाहर भीतर सभी जगह उजाला फ़ैल गया है, अतः अब हम समाधि-सुख का अनुभव करने में ही मस्त हैं ॥२१॥
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*देह भिन्न आत्मा भिन्न है,*
*लिपै न कबहूँ ज्यौं आकाश ।*
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवैं सुन्दरदास ॥२२॥*
अब हम जान चुके हैं कि हमारा यह देह अलग वस्तु है और आत्मा अलग, अतः इस देह द्वारा किये हुए कर्म आत्मा को कभी नहीं लग सकते । आत्मा तो उनसे उसी तरह निर्लिप्त है, जैसे जगत् के कार्यों से आकाश निर्लिप्त रहता है । अतः हम क्यों न समाधिसुख में ही आकण्ठ निमग्न रहें ! ॥२२॥
(क्रमशः)

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