गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

= सुख समाधि(ग्रन्थ ४/५-६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
.
*(ग्रन्थ ४) सुख समाधि*
.
*आतम तत्व विचार निरन्तर,*
*कीयौ सकल कर्म कौ नास ।*
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवै सुन्दरदास ॥५॥*
यह आत्मतत्व का निदिध्यासन(निरन्तर मनन-चिन्तन) ही मनुष्य के सब कर्मों का नाश कर सकता है । और नाश हो जाने पर योगी निर्विकल्प समाधि सुख का आनन्द लेता हुआ अपने को धन्य मानता है ॥५॥
*और कछू उर मैं नहिं आवै,*
*वातैं कोऊ कहौ पचास ।*
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवै सुन्दरदास१॥६॥* 
(१. इस से आगे प्रायः सब छन्दों में अन्य क्रियाओं और साधनों की ब्रह्मानन्द मिल जाने पर आवश्यकता, और मिल जाने जो उच्चकोटि की स्थिति होती है उस का वर्णन किया है । ऐसा ही वर्णन 'सवैया' के *'आत्मानुभव अंग'* में है -
*"क्या कहिये कहते न बनै कछु*
*जो कहिये कहते ही लजइये',* 
*'दीवा करि देखै सुतो ऐसी नहि लाइ है',*
*'सुन्दर आतम को अनुभो सोइ*
*जीवत मोक्ष सदा सुख चैना' ।* 
*'सुन्दर साक्षात्कार अनुभो प्रकाश है' ।* 
.
अथवा *'प्रेमपरा ज्ञानी के अंग में'*, 
*'सुन्दर कोउ न जान सकै यह*
*गोकुल गाँव पैंडो की न्यारी'*  
.
*या 'आश्चर्य के अंग'* में - 
*सुन्दर मौन गही सिद्ध साधक*
*कौन कहे उसकी मुख बातैं' ॥* 
.
और 'साखी' में *'आत्मानुभव के अंग'* में 
*'सदा रहै आनंद में, सुन्दर ब्रह्म समाई ।*
*गूंगा गुड़ कैसे कहै, मनही मन मुसकाइ' ।*) सु०२ :१५
तब उसके मन में और कुछ नहीं आता, उसकी इन्द्रियाँ अपने विषयों की ओर नहीं दौड़तीं, भले ही उसे कोई लाख प्रलोभन की बातें कहे । वह तो उस समय उस समाधिसुख में निमग्न रहकर ही कृतकृत्य हो जाता है ॥६॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें